क्या अमेरिका की भारतीय राजदूत या भारत सरकार का कोई मंत्री आम जनता से अलग है? – Is Indian Ambassador to USA or any Minister of Government of India different than general public?

मैं अमेरिका की भारतीय राजदूत  मीरा शंकर के बारे में एक समाचार, विभिन्न समाचार पत्रों में पढ़ा जिसमें किसी एअरपोर्ट पर उनके सामान की जाँच होने पर  भारत ने बखेड़ा खड़ा कर  दिया था | भारत की मीडिया ने इसे बहुत बड़ा  डील बना लिया था और इसे प्रथम पृष्ठ पर कई दिनों तक छापा करता था | इससे दूसरे विकशित देशों में भारत की बहुत बदनामी हुयी थी | हमने कभी नहीं पाया की विकशित देश के लोग इस तरह का मुद्दा कभी उछाले हैं और किसी देश के नियम-कानून के पालन में अपना अनादर महसूस करते हैं या भारतीयों जैसा अहंकार का मुद्दा बनाते हैं | विकशित देशों में आम जनता एवं लोक-सेवकों में कोई अंतर नहीं होता और सरकार के लिए वेतन पर काम करने वाले लोक-सेवकों को आम जनता से ऊपर स्थान देने के  लिए इतना बड़ा बखेड़ा नहीं होता | भारतीय जनता को बराबरी क्यों नहीं पसंद है और वे क्यों सरकारी नौकरों को ज्यादा पदवी या भाव देना चाहते हैं? सुरक्षा की दृष्टी से मीरा शंकर  के पर्स, थैलों और  दूसरे सामानों की जांच करने में क्या गलत था? यह तो प्रत्येक भारतीय के साथ होता है और वह भी भारत की आम जनता की तरह ही हैं |  हम सामंती मानसिकता को कब तक ढोते रहेंगे ? क्या हमें  इसका अंत  नहीं करना है?  मेरा, पढ़े-लिखे मीडिया के लोगों से निवेदन है की भारत में ऐसे किसी कर्यवाही को हमेशा हतोत्साहित करें जहाँ फालतू के प्रोटोकॉल का बहाना  लेकर बराबरी के नियम कानून को तोडा जाय |  मुझे ऐसा लगता है की आज भी भारतीय, ब्रिटिश राज के नियम-कानूनों को ढोना  चाहते हैं और सरकारी नौकरों को विशिष्ट व्यक्ति की तरह पूजना चाहते हैं | चूँकि मीरा शंकर को उनके काम के लिए भारत सरकार से पैसा मिलता है और बाकि वे भारत की एक आम नागरिक की तरह ही हैं, तो वह अन्य आम जनता जैसे मेरे ग्रामीण दोस्त बुधई राम से ज्यादा महत्वपूर्ण एवं आदरणीय क्यों हुयी? इसके लिए हमें अमेरिकियों को बधाई देनी चाहिए जो आम जनता एवं लोक-सेवकों में कोई  भेदभाव नहीं करते और भारत  के ऐसे कई सामंती मानसिकता वाले लोगों की जांच निडर होकर करते हैं | मेरा भारत के विदेश मंत्री कृष्णा को सुझाव है की इसे वो कोई मुद्दा न बनायें और यदि मुद्दा बनाना  ही  है तो फिर उन सभी भारतीयों के लिए बनायें जो प्रतिदिन इस दौर से गुजरते हैं और आप जैसे सरकारी सेवकों को तनख्वाह  देने के लिए सरकारी खजाने में योगदान भी करते हैं |  कब भारत के लोग यह समझेंगे की एक प्रजा-तंत्र में आम जनता, सरकारी नौकरों जैसे राजदूत, मंत्री  इत्यादि की बॉस होती है, और वे कब ऐसे प्रोटोकॉल को समाप्त करने के लिए कदम उठाएंगे जो इस तरह के भेदभाव के लिए ब्रिटिश राज के समय में बनाये गए थे? हम कब समानता के कानून पर अमल करेंगे, जैसा की अमेरिका में होता है?

I read a news on Meera Shankar, Indian Ambassador to USA. Most of the media make it a big news and printed it on front page. Why Indians don’t love equality and wanted public servant respected? Was there anything wrong in searching her baggage and other stuff for security reasons? She is like any other general public of India. Indians still want to practice British kind of rule, the VIP treatments to public servants. She is paid for her work so why is she more important and respectable than any other general public like my poor village friend Budhdhai Ram. Good Job Americans!!! Don’t cry Mr. Krishna, there is nothing wrong in it, otherwise you should cry for all Indians who passes through this kind of search everyday and they are the people who contribute for the payment of public servants like you. When people of India will understand that general public is boss of public servants and work to abolish such protocols which differentiate the public servants and general public. When are we going to practice the law of equality, like US does?

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