Archive for January, 2011

भारत की अखंडता के लिए विनायक सेन से ज्यादा खतरनाक भ्रष्ट अधिकारी एवं लोक-सेवक हैं – Corrupt Lok-Sevaks are more dangerous to integration of India than Vinayak Sen

January 4, 2011

मैंने हाल ही में विभिन्न  समाचार पत्रों में पढ़ा की एक समाज सेवक, श्री विनायक सेन, को किसी मामले में एक स्थानीय न्यायपालिका ने एक नियत समय में निर्णय लेते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनायी  है लेकिन ऐसा कोई उदाहरण जिसमें  कभी किसी  न्यायपालिका द्वारा कोई फैसला  एक नियत समय में  किसी भ्रष्ट नेता, अधिकारी या लोक-सेवक के खिलाफ दिया गया हो, मैंने कभी नहीं सुना |  उदाहरण के तौर पर बहुत सारे राजनीतिज्ञों, जैसे मधु कोड़ा, लालू यादव, मायावती, जयललिता, कलमाड़ी, राजा, मुलायम, अपांग, सुख राम, येदुरप्पा, देशमुख, राजीव गाँधी,  शिबू, नरसिम्हा राव, जगन्नाथ मिश्रा एवं अन्य पूर्व मंत्रियों तथा लोक-सेवकों, के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले बहुत दिनों से लंबित हैं लेकिन मुझे नहीं पता की कभी उन मामलों पर नियत समय में सुनवाई कर उनके जीवित रहने में ही कोई फैसला न्यायपालिका द्वारा सुनायी जाएगी और दोषी पाने पर उन्हें सजा भी हो सकेगी | हर सरकारी बिभाग में भ्रष्टाचार एवं घूसखोरी होने के वजह से मुख्यतया  गरीब एवं दबे-कुचले इसका शिकार हैं और उन्हें उनका वाजिब हक़ नहीं मिल पा रहा है|  भ्रष्टाचार के कारण न्यायपालिका, नियम-कानून एवं विकाश पर बहुत ही बुरा असर है और अधिकाँश जनता न्यायपालिका, पुलिस एवं जांच एजेंसी जैसे सीबीआई, सीआईडी या सीबी-सीआईडी में विश्वास नहीं रखती | क्या कोई मुझे बता सकता है की आज अपने देश में भ्रष्ट लोक-सेवक ज्यादा खतरनाक है या विनायक सेन जैसा आम आदमी? मेरे और मेरे टीम के द्वारा एकत्रित किये गए आंकणाओं के आधार पर हम यह कह सकते हैं की आज हमारे देश की एकता एवं संप्रभुता के लिए विनायक सेन से जयादा खतरनाक हमारे देश के भ्रष्ट लोक-सेवक हैं |  यदि समय रहते अपने देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगाया गया तो देश का हर एक नागरिक इन भ्रष्ट लोक-सेवकों के खिलाफ हथियार उठा लेगा और भ्रष्ट सरकारों के खिलाफ युद्ध छेड़ देगा |

I recently read a news that one Mr. Vinayak Sen, a social activist, got verdict for life imprisonment from a local court but I haven’t seen any corrupt politicians or Lok-Sevaks got any such punishment in India. For example, there are many politicians such as Madhu Koda, Lalu Yadav, Mayawati, Jayalalitha, Kalmadi, Raja, Mulayam, Apang, Sukh Ram, Yedurappa and many other ex-ministers and Lok-Sevaks etc against whom charges of corruptions are pending but we don’t know if any verdict can come in their life time or not. Because of corruption/bribe at every level in every government department, mostly the poor and oppressed are the victims of this and they are not getting their due benefits. Judiciary, Law & Order and Developments are terribly impacted due to corruption and most of the public don’t have faith in Judiciary, Police, and investigation agencies such as CBI and CB-CID. Can anyone explain if, Vinayk Sen is more dangerous to country or corrupt Lok-Sevaks? As per the data collected by me and my team, I feel that corrupt Lok-Sevaks are more dangerous to integration of India than Vinayak Sen and if the corruption is not checked sooner or later, that day is not far away when every citizen will take weapons against the Lok-Sevaks and fight against the corrupt governments.

For more details, please read the e-book.

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उत्तर प्रदेश में प्रजा-तंत्र की सच्चाई – Truth of Democracy in Uttar Pradesh

January 1, 2011

मेरी टीम ने हाल ही में उत्तर प्रदेश राज्य में सम्पन्न हुए एम. एल. सी.  के चुनाव के ऊपर आंकड़ा एकत्रित किया था | यह आंकड़ा आपको यह कहानी बयाँ करेगी की हमारे प्रत्याशी किस तरह के लोकतान्त्रिक तरीके से चुनाव में  जीत   हासिल  किये थे |  आंकड़े यह बताते हैं चुनाव जीतने वाले  अधिकांश  विजेताओं  ने   करीब ३५००० रुपये से ५०००० रूपये देकर प्रत्येक  मतदाता को वोट देने के लिए खरीदे  थे | इस चुनाव में वोट डालने वाले मतदाता विभिन्न पंचायतों एवं राज्य तथा राष्ट्रीय असेंबली के लिए चुने गए सदस्य जैसे ग्राम प्रधान, जिला पंचायत सदस्य, विधायक, संसद सदस्य आदि थे | ज्यादातर  विजेताओं ने अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए ५० लाख से अधिक  रुपये खर्च किये थे |  आईये अब हम अपने लोकतंत्र पर इस चुनाव के प्रभाव का विश्लेषण करते हैं |  सबसे पहले, एक व्यक्ति जो इस तरह से 50 लाख से अधिक रुपये बर्बाद कर सकता है वह  निश्चित  रूप से राजाओं की  तरह  एक विलासिता-पूर्ण जीवन जीता होगा तो क्यों वह एक सरकारी नौकर बनना चाहता है ?  निश्चित तौर पर  हमारे लोकतंत्र और संविधान में कुछ गड़बड़ है जो उन्हें मालिक  या कुच्छ और का दर्जा दिलाती है, सरकारी नौकर का नहीं |  इस तरह से हमारे निर्वाचित एम. एल. सी. का मूल्य ५० लाख रुपये या उससे अधिक का बनता है | वे इतना पैसा क्या केवल सरकारी नौकर बनने के लिए तथा लोगों की सेवा के लिए खर्च करते हैं, जिसके लिए  उन्हें तनख्वाह  कहीं २५००० रुपये से ३५००० रुपये तक मिलती है?

क्या कभी आप यह कल्पना कर सकते हैं की कोई  व्यक्ति ५० लाख रुपये या इससे अधिक  का खर्च सिर्फ आम जनता की सेवा करने एवं मिलने वाले तनख्वाह पर ही निर्भर रहने के लिए  कर सकता है?  क्या यह तनख्वाह उसके लिए बस होगा और क्या वो अपने ब्यय किये हुए ५० लाख रुपये भ्रष्ट तरीके से कमाने की कोशिश नहीं करेगा?  यदि वह अपनी पूरी तनख्वाह का भी बचत करता है तो वो अपनी नौकरी की ५ साल की पूरी अवधि में १५ लाख से अधिक रुपये नहीं बचा पायेगा |  तो क्यों वे किसी भी तरह से सरकारी नौकर बनने के लिए बेचैन रहते हैं और राजनिति के अलावा और कोई दूसरा व्यवसाय नहीं करना चाहते हैं? वे क्यों नहीं इस कार्य को जरूरतमंद बेरोज़गार युवकों के लिए छोड़ देते हैं?  एक शुद्ध लोकतंत्र में आम जनता का जगह चुने हुए जनप्रतिनिधि से ऊपर होता है (क्योंकि वोट के लिए वे आम जनता के सामने समय-समय पर झुकते रहते हैं) | लेकिन हमारा प्रजा-तंत्र इन जन-प्रतिनिधियों एवं मंत्रियों को नियंत्रण करने में नाकामयाब है जिससे की वे एक सरकारी नौकर की तरह बर्ताव नहीं करते और पैसे कमाने के लिए भ्रष्ट कार्यों में पूरी तरह से संलिप्त हो जाते हैं |   इसका मुख्य कारण यह है की  हम  सही  मायने  में एक त्रुटी-विहीन लोकतंत्र के नियमों का पालन नहीं करते और हमारे जन-प्रतिनिधि की सोच आज भी सामंती युग की तरह है जो यह सोचते हैं की इस तरह का पद मजा लेने एवं ब्रिटिश राज की तरह शक्ति अर्जित करने के साथ-साथ प्रभाव कायम करने के लिए है |  वे ये सोचने लगते हैं की यहाँ पहुंचकर बहुत रुतबा मिलेगा और बहुत सारे मौके मिलेंगे जिसमे वैधानिक तरीके के साथ  लूट-खसोट किया जा सकता है और उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है |  इस त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र की वजह से उनकी सोच यह है की यहाँ पहुंचकर उन्हें ब्रिटिश राज की हुक्मरानों की तरह राज करने को मिलेगा और एक ऐसी प्रतीकात्मक प्रतिष्ठा मिलेगी जो आम जन एवं कानून से उन्हें ऊपर रखेगी |  

ऐसे जन-प्रतिनिधियों के लिए राजनिति एक व्यवसाय है  और इसके साथ ही उन्हें ऐसे पद पाने से यह अनुभूति होती है की वे संसार से ऊपर हो गए है क्योंकि राज्य की सारी सरकारी मशीनरी बेकार की प्रोटोकॉल एवं त्रुटी-पूर्ण जन-तंत्र के वजह से उनके सामने घुटनों के बल रेंगती रहती है |  चूँकि ये लोग विधान सभा में नियम-कानून बनाते हैं इसलिए इनसे कौन बोलेगा की आप लोग  अपने  पैरों  पर  कुल्हाड़ी   मारिये और इन उल-जुलूल के प्रोटोकालों को बदलिए एवं ऐसा कानून बनाईये जिससे जन-प्रतिनिधि का रुतबा आम जन से कम हो जाये और वे अपने को जनता का नौकर समझने लगें |  यदि कुछ इमानदार जन-प्रतिनिधि ऐसा कानून बनाने की कोशिश करेंगे भी तो बहुसंख्यक  इसे रोकने की कोशिश करेगा क्योंकि अधिकतर सामंती मानसिकता वाले लोग ही इसमे गए हुए हैं |  अगर हम पश्चिमी देशों के प्रोटोकॉल पर विचार करें तो हम पाते हैं की एक गवर्नर या किसी उच्च संवैधानिक पद पर बैठे हुए व्यक्ति को आम जनता का ही दर्जा मिला हुआ है  और कोई भी उन्हें कोई विशेष मान नहीं देता है |  लेकिन अगर आप भारत के किसी राज्य के मुख्यमंत्री पर विचार करें तो देखेंगे की हालांकि अगर वह किसी निजी यात्रा या निजी काम पर भी है तो भी पूरे राज्य की सरकारी मशीनरी अपने पैर की उंगलियों पर खड़ी हो जाती है | इस तरह की फालतू की प्रोटोकॉल की वजह से बहुत सारे  लोग  ऐसे पद पाने के लिए मरने के लिए भी तैयार  रहते हैं |  हमें  इस तरह के अनावश्यक प्रोटोकॉल और कानून में बदलाव लाने की जरूरत है |  लेकिन लाख टके  का सवाल यह है कि इसे बदलेगा कौन?  निश्चित रूप से हमारे नेता ऐसे प्रोटोकॉल को बदलना नहीं चाहेंगे  क्योंकि वे वहां लक्जरी और प्रतिष्ठित जिंदगी जीने के लिए गए हुए हैं  और वे निश्चित ही इसे खोना नहीं चाहेंगे |     

मेरा दूसरा सवाल यह है कि क्यों ऐसी सोच वाले  लोग निर्वाचित हो रहे हैं? ऐसा मुख्यतया इसलिए है की प्रत्येक व्यक्ति कानूनी या गैर कानूनी तरीके से अथाह पैसा कमाने का तरीका ढूंढ़ रहा है  |  चूँकि पंचायत के लिए निर्वाचित लोगों को ज्यादे मौके पैसे कमाने या लूटने के लिए नहीं मिलते हैं अतः उन्हें लगता है कि इस तरह के चुनावों में एक महान अवसर उन्हें कुछ पैसे बनाने के लिए मिल रहा है | क्या हम कह सकते हैं वे गलत  हैं और उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए? लेकिन किसी को भी अपने को  पैसे लेने से रोक   पाना बिलकुल असंभव होगा जहाँ यह बिना मेहनत के और मुफ्त में उनके दरवाजे पर आ रहा हो |  केवल एक या दो अपवादों को छोड़ कर हमे कोई ऐसा नहीं मिला जो इस चुनाव में पैसा न लिया हो |  यह दीगर बात है की कोई-कोई मतदाता एक से अधिक प्रत्याशियों  से पैसा लिया या किसी  एक से लिया और दूसरे  को वोट दिया, लेकिन पैसा लगभग सभी मतदाताओं ने लिया |  अब आप यह कह सकते हैं की चुनाव आयोग यह सब देखने के लिए है और  यह ऐसा नहीं होने दे सकता है |  हाँ, चुनाव आयोग तो है और उसने अपने नाक के नीचे ऐसा होते हुए देखा, लेकिन उसने क्या किया? कुछ भी नहीं |  यदि चुनाव आयोग के पास कोई शिकायत लेकर गया भी तो उसने पूछा की आपके पास सबूत क्या है? इसके लिए क्या सबूत दिया जा सकता है?  इस लेन-देन का पेपर पर कोई सबूत नहीं है और क्यों कोई फालतू में अपना मुंह खोलेगा जिसको मुफ्त में ही कुछ पैसे का लाभ हो गया हो?  फिर इसका हल क्या है? इसका हल यही है की या तो केवल ऐसे लोग चुनाव में खड़े हों जो बहुत ही इमानदार हों और चुनाव जीतने के लिए एक भी  पैसा खर्च न करें या मतदाता राज्य के हित के लिए पहले सोंचे और पैसा बनाने की लिए बाद में, और  सही आदमी को अपना बहुमूल्य वोट देकर विजयी बनाये |

यह सबको पता है की जो जितना ही पैसा ऐसे चुनाव में जीतने के लिए खर्च करेगा वो अपने खर्च किये हुए पैसे को निकालने के लिए उतना ही अपने राज्य को लूटेगा और मतदाताओं को हमेशा इस बात को मन में रख कर वोट डालनी चाहिए |  लेकिन हम मतदाताओं को इस मुफ्त के पैसे की लालच से कभी नहीं रोक सकते | मतदाता यह सोचने को तैयार ही नहीं हैं की उनकी इस लालच एवं करनी की वजह से राज्य की अन्य जनता के हक़ पर फर्क पड़ता है और इस तरह से कानूनी तौर पर वे अपराध कर रहे हैं |  अतः या तो हमें अपने नियम-कानूनों में जल्दी ही फेर-बदल कर ऐसे कानून लाने चाहिए जिससे  की एक तय समय-सीमा के अन्दर भ्रष्ट लोगों को सजा दिया जा सके और अन्य दूसरों के दिल में ऐसा न करने के लिए डर पैदा  किया जा सके, या फिर अपनी नयी पीढ़ी को  इमानदार कैसे बनाया जाय, उसके बारे में सोचें|  उदहारण के तौर पर जो भी भ्रष्टाचार के मामले दिग्गज लोगों, जैसे सुखराम, लालू, जगन्नाथ, देशमुख, मुलायम, राजा, मायावती, जयललिता, थामस, मधु कोड़ा, सिबू, कलमाड़ी इत्यादि के खिलाफ लंबित हैं, पर त्वरित कार्यवाही हुयी होती और दोषियों को उनके अंजाम तक पहुंचा दिया गया होता तो दूसरे नीचले तबके के दिग्गजों में डर का एक सन्देश गया होता और हम कुछ हद तक भ्रष्ट तत्वों पर लगाम  कसने में कामयाब होते और लोग राजनिति को पैसा कमाने का जरिया नहीं समझते |  भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्यवाही एवं डर न होने के वजह से ही दिन ब दिन जयादा से ज्यादा सरकारी नौकर भ्रष्टाचार में लिप्त होते जा रहे हैं और हमने यहाँ तक देखा है की कुछ  पकडे  गए  भ्रष्टाचारियों के खिलाफ  चार्जशीट बनने के बाद भी राज्य सरकार भ्रष्टाचारियों के पहुँच एवं प्रभाव की वजह से उनकी फाईल आगे नहीं बढाती और उन पर मुकद्दमा चलने नहीं देती |  इस तरह से सभी भ्रष्टाचारी बेदाग़ और बिना सजा के राज्य के लुटे हुए पैसों पर विलासिता-पूर्ण जिंदगी जीने में कामयाब हैं |

मैं किसी भी सरकार को यह सुझाव देना चाहूँगा की गरीबों के लिए कोई भी सरकारी योजना लाने के पहले भ्रष्टाचार पर पूरी तरह से लगाम लगायें, नहीं तो इन योजनाओं का लाभ ऐसे ही धनी एवं भ्रष्ट तत्व  लूटते  रहेंगे जिसकी वजह से धनी और गरीब के बीच की खाई लगातार गहरी होती जाएगी जिसे पाटा नहीं जा सकेगा और एक दिन यह एक जन-विद्रोह को जन्म दे देगा |  चूँकि भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून बनाना इतना आसान नहीं होगा क्योंकि इसका सबसे ज्यादा प्रभाव सामंती युग का जीवन जीने वाले उच्च पदेन दिग्गजों पर पड़ेगा और वे कभी नहीं चाहेंगे की उनकी सोच  में खलल पड़े और उनकी मानसिकता को आम जनता  से नीचे होने एवं अपने को उनका  नौकर समझने में बदलना पड़े |  कोई भी राजनितिज्ञ या नेता यह नहीं चाहेगा की ऐसा कोई कानून बने जिससे उसकी मनः स्थिति में बदलाव आये तथा लूट-खसोट कर पैसा अर्जित करने का मौका न मिले | यदि ऐसा कोई कानून बना भी तो वे चाहेंगे की यह  उनके ऊपर लागू न हो |  अतः हमें करना यह चाहिए कभी भी इन विशिष्ट या बहुत विशिष्ट कहे जाने वाले सरकारी नौकरों को कोई तबज्जो न दें |  दूसरा विकल्प यह है हम अपनी नयी पीढ़ी को इमानदार एवं नैतिकता-पूर्ण नागरिक बनायें और इसके लिए हम प्रत्येक स्कूल जाकर हर एक बच्चे को अच्छा नागरिक बनने का पाठ पढ़ाएं ताकि वो आगे चलकर अपने अन्दर राज्य के लिए पहले और अपने लिए बाद में सोचने की प्रवृति लायें | अच्छे लोगों की यह नयी पढ़ी अवश्य ही इस भ्रष्ट जन-तंत्र को बदलने में कामयाब होगी |

मेरे अनुसार  एक अच्छा लोक-सेवक ( मंत्री, जिलाधिकारी, पुलिस कप्तान, नेता या सरकार द्वारा वेतन लेने वाला कोई भी व्यक्ति ) वह है जिसके अन्दर निम्न गुण मौजूद हों:

१. वह राज्य की जनता के लिए पहले सोचे और अपने लिए उसके बाद

२.  वह बहुत ही इमानदार हो

३. वह देने में विश्वास रखे, लेने में नहीं

४. वह हमेशा राज्य की जनता के कल्याण के लिए काम करे और उन्हें वाजिब सम्मान दे

५. वह किसी भी भ्रष्ट कार्य में लिप्त न होकर दूसरों के लिए एक उदहारण बने

६. वह सिर्फ दिए गए वेतन पर निर्वाह करे और गलत तरीके से पैसा कमाने का न सोचे

७. जनता का काम करने के बदले किसी और चीज की आशा न रखे

८. वह किसी भी तरह का भ्रष्टाचार बर्दाश्त न करे

जिस दिन हमारे चुने हुए सभी जन-प्रतिनिधि उपर्युक्त गुणों से सम्पन्न हो जायेंगे उस दिन से हमारे राज्य की विधान सभा एक महानतम सभा में परिवर्तित हो जाएगी और उस दिन से निश्चित तौर पर  उत्तर प्रदेश का उत्तम  प्रदेश में बदलना प्रारंभ हो जायेगा |

My team gathered data on recently conducted MLCs election in state of UP. It will tell you the story of how our candidates were democratically elected in this election. The data shows that most of the winner in this election bought votes by paying Rs 35,000 to Rs 50,000 to each voter of the election. Voters of this election were mostly the elected members of Panchayat and State and National assemblies such as Gram Pradhans, MLAs, MPs, Zilla Panchayat’s members etc. Most of the winners spent more than Rs 50 Lakhs each to make sure of their victory. Now let us analyze the impact of this election on our democracy. First of all, a person who can waste more than 50 Lakhs like this, will certainly be having luxury to live life king size so why he/she wants to become a public servant. Definitely there is something wrong in our democracy and constitution, which powers them as Maliks (masters) and not as Lok-Sevaks (public servants). Our elected MLCs are worth Rs 50 Lakhs or more. They spent this money to become a public servant and serve our people for which their monthly pay would be somewhere from Rs 25,000 to Rs 35,000.

Now can you imagine a person who spends Rs 50 Lakhs, just to serve people on only the mere salary? Would this salary be sufficient for him/her, and can’t he/she try to recover his/her Rs 50 Lakhs spent by corrupt practices. Even if he/she tries to save every month’s salary, he/she could not save more than 15 Lakhs during his /her tenure of 5 years. So why they are so enthusiastic to become a public servant by any means and don’t want to do business other than politics? Why they don’t want to leave this job for unemployed needy youths? In real democracy, public is above the elected members (they bend to public for vote). But our democracy is unable to check our representatives and ministers to behave like public servant and to stop indulgence in corrupt practices.  The reason behind this is that we don’t practice the true democracy and our representatives are still thinking that these positions are to enjoy and have power and influence like the British’s rulers. They think there would be a high status in society and there is lot of ways to earn lot of money. They would get chance to live life like British ruler and have a status symbol which generalizes them above the general public and law.

Politics is means of business to most of them and a way to feel on top of world because of state machineries are made to bend on their knees due useless protocols and faulty democracy. Since they are the lawmakers, who will ask them to axe on their own legs, I mean ask them to make law to mend their way of thinking and think themselves as public servant (below the general public). If few honest politicians will try for this, majority would try to halt. If we consider the protocols in western countries, I have seen a governor or a person at highly constitutional position meets the same status of general public, and no one gives them any value. But, if you consider a Chief Minister of a State of India, though, if he/she is on personal visit/work, whole state machineries would be on its toes. Because of this kind of protocols, people are dying to acquire such positions and we need a change in such unnecessary protocols and laws. But the million rupees question is who is going to change it? Definitely our politicians will not do so because they are there for luxury and status and they would certainly not want to loose.

Another question is why people with such thinking are getting elected? This is mainly because everyone looks for the means to earn money either legally or illegally. Since Panachayat members don’t have many other chances to earn money, they think this a great chance in such elections to make some money. Can we say they are wrong and they should no do so? But it’s very difficult for anyone to not to take money coming freely and though without any efforts. Except one or two exceptions, we didn’t find any person who didn’t take the money. It’s different mater, if they received it from more than one candidate, or took from one and voted to other, but everyone took it. Now you can say, there is election commission watching this. It’s not possible. Oh, yes it watched but what did it do? Nothing. If anyone going to complain, it would ask for proof. What proof you are going to give. There is no transaction on paper and why people will open mouth, if they got free money. So what is the solution? The solution is either honest candidate who can’t spend a single paisa, fight the elections or voters should think about country first and not the money and vote the right person.

Every one knows that the person who spends more money in election would be looting our country more to recover the money spent, and voters should keep this always in mind. But we can’t stop voters from allurement of money. Thus we either need some change in laws to quickly punish the corrupts and instigate fear in them, or make our new generations honest. For example, if the court cases of corruption against heavyweights like Sukhram, Lalu Yadav, Jagnnath Mishra, Mulayam Singh Yadav, Mayavati, Madhu Koda etc, would have come to conclusion quickly and guilty would have been punished, there would have been fears sent in lowweight politicians and bureaucrats, and at some extent there would have been some check on corruption. Because of no fears against corruption, more and more government officials are getting involved day by day in corruption, and even if they are caught and charge sheets are prepared, their files don’t move and they mange to escape through money and their link. There is lot of cases of corruption waiting for clearance from government against many government officials but they are not cleared because of influence of corrupt people.

What I would like to suggest any government is that, first make arrangements to check the corruption before driving and schemes for the benefit of poor, otherwise the gaps between rich and poor will get bigger and bigger. Since it’s not easy to have change in laws and its implementations quickly on heavyweights, and moreover, such law would develop a change in the mentality of high position people to think them as lower than general public and servant of public, politicians are not going to bring such laws which mend them to think like this. What we should do is, to stop giving value to such so called VIPs and VVIPs. Other option is to visit schools and educate our children to become good citizen and firstly think about country before thinking about themselves. This new generation of good people will certainly change the system.

For me, the true Lok-Sevak (DMs/SPs/Ministers/Politicians etc) is that who possesses the following qualities:  

  1. He/She should think about country first before thinking for himself/herself
  2. Should be honest
  3. Believe in ‘give’ and not to ‘take’
  4. Work for the welfare of our people and give respect to them
  5. Set an example by not involving in any kind of corrupt practices
  6. Work without anticipation of anything
  7. Not to tolerate corruption of any kind.

The day when our all the elected MLAs/MLCs can have all the above mentioned qualities, we would be having a great assembly in State of UP and UP would certainly get transformed into Uttam Pradesh from then onwards.


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