लोक-सेवकों की उपलब्धता – On “Accessibility of Lok-Sevaks” – by Dr. Vinaya K. Singh, Ph.D

 

किसी भी स्वस्थ्य प्रजा-तन्त्र के लिए लोक-सेवकों की उपलब्धता बहुत ही महत्वपूर्ण होती है | लेखक की शोध के मुताबिक ग्रामीण अंचलों में रहने वाले लोगों को कोई भी छोटा सा छोटा काम कराने के लिए तहसील और जिला स्तर के सरकारी कार्यालयों का कई चक्कर लगाना पड़ता है |   यदि किसी तरह से काम का कुछ भाग हो भी जाता है तो अगले भाग के लिए कुछ अडंगा लगा दिया जाता है और फिर ग्राहक को उसे निपटवाने के लिए कार्यालयों के फिर कई चक्कर लगाने पड़ते हैं | इसका मुख्य कारण यह है की जब लोग सरकारी कार्यालयों पर पहुंचते हैं तो कई बार लोक-सेवक या तो मीटिंग में ब्यस्त, छुट्टी पर या बिना बताये कार्यालय से गायब रहता है |  यदि कभी-कभार लोक-सेवक मिल भी जाता है तो घूस न मिलने का कारण काम को अटका देता है | इस तरह से काम करने के लिए गाँव से सरकारी महकमों के लिए भाग-दौड़ में काफी पैसा खर्च हो जाता है और ग्रामीणों के लिए सरकार द्वारा प्रदत्त सेवा का अधिकार बहुत महंगा पड़ता है | बहुत सारे ग्रामीण रोज़ की कमाई पर गुजारा करते हैं और यदि वे अपने सरकारी काम निपटवाने के वास्ते इस तरह से अपना रोज़ी-रोटी छोड़कर कार्यालयों के चक्कर लगाते हैं तो आप उनकी कठिनाईयों और दिल की पीड़ा का अंदाज़ा नहीं लगा सकते | यदि कोई इस पीड़ा से गुजरा है तो वही इसका एहसास कर सकता है | लोगों की इस पीड़ा को मिटाने के लिए,  तथा प्रजा-तंत्र में प्रजा के लिए सरकारी सेवा के अधिकार के तहत, सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए की सरकारी कार्यालयों में लोक-सेवकों की उपलब्धता निरंतर बनी रहे और कोई भी आदमी  किसी कार्यालय में जाता है तो उसकी शिकायतों को सुनने एवं उसे निर्बाध रूप से मौके पर ही निपटाने के लिए कोई न कोई अवश्य मौजूद रहे |

 

इसके अलावा यह एक टेलीकम्युटिंग का ज़माना है, अतः यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए की राज्यपाल, मंत्री, सचिव, डी. जी. पी., डी. एम., एस. पी., और अन्य दूसरा लोक-सेवक या जन-प्रतिनिधि आसानी से टेलीफ़ोन, ई. मेल या फैक्स के माध्यम से भी उपलब्ध रहे |  किसी भी कार्यालय के अधिकारी का यह दायित्व बनता है की वह यह सुनिश्चित करे की जनता के प्रत्येक आने वाले फ़ोन का उत्तर या हर एक     ई-मेल या फैक्स का जवाब जरूर दिया जाय एवं उनके शिकायतों का निपटारा गुणवत्ता-पूर्वक किया जाय |  यदि कोई लोक-सेवक जनता की कार्य-सेवा की वजह से बहुत व्यस्त है तो उसे यह इंतजाम करना चाहिए की कोई ग्राहक सेवा प्रतिनिधि उसकी अनुपस्थिति में सदैव जनता की संदशों को ले और बाद में लोक-सेवक की उपलब्धता पर जनता के साथ लोक-सेवक का संवाद उनके शिकायतों के निपटारे के लिए टेलीकम्युटिंग या किस अन्य माध्यम  से बिना भूले कायम कराये |  शोध के मुताबिक़ यह पता चला की उत्तर प्रदेश के किसी भी कार्यालय में ऐसा नहीं होता | प्रत्येक कार्यालय में सरकारी कार्यों के लिए लोक-सेवकों में कार्य-संस्कृति चौपट है और सरकार द्वारा निर्देशित आचरण के पालन का आभाव है | इसका एक कारण यह भी है समय-समय पर लोक-सेवकों को कार्य-संस्कृति  एवं सरकार द्वारा निर्देशित आचरण के पालन का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता | 

किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे लोक-सेवक जैसे राज्यपाल या मुख्य-मंत्री  के मन में कभी भी ब्रिटिश राज के  अधिकारियों की तरह यह भाव नहीं आना चाहिए की वह वहाँ जनता का फ़ोन लेने के लिए या उनकी सेवा के लिए नहीं है | उत्तर-प्रदेश के अधिकतर लोक-सेवकों की मानसिकता ब्रिटिश राज के  अधिकारियों की तरह ही है और यह उत्तर प्रदेश के लिए शुभ नहीं है | यदि कोई लोक-सेवक की सोच ऐसी है तो वह ऐसे पद के लिए उपयुक्त नहीं है और उसे पद को स्वेच्छा से छोड़ देनी चाहिए | कतार में बहुत सारे लोग किसी भी पद को   लेने के लिए लगे हैं | ऐसे बहुत सारे मामलों में सर्वेक्षण से लेखक को पता चला की उच्च पदों पर बैठे लोक-सेवकों के सचिवों को यह ताकीद या प्रशिक्षण दी जाती है की वे कोई-न-कोई बहाना बना कर आम जनता को टरका दे और उनसे न मिलने दे, यदि उनके साहब या किसी प्रभावशाली व्यक्ति का कॉल  आये तभी उन तक  पहुंचायें | इसके लिए वे ऐसे बहाने, जैसे साहब नहा रहे हैं, खा रहे हैं, पी रहे हैं, जनता की सेवा करके थक गए हैं तथा आराम फरमा रहे है, मीटिंग में हैं या सो रहे हैं, का प्रयोग करते हैं | यह एक लोक-तांत्रिक राज्य के लिए बहुत बड़ा खतरा है और ऐसी कार्य-शैली को ख़तम करना उत्तर प्रदेश की आज की जरूरत है |  यदि किसी लोक-सेवक से कोई अपने कार्य के सिलसिले में मिलना चाहता है तो लोक-सेवक के सहायक का यह फ़र्ज़ बनता है की वह जनता की किसी भी हालत में लोक-सेवक से मिलने का प्रबंध करे, न की टरकाए  |  यह तभी संभव है जब राजनितिक पार्टियों में इच्छा-शक्ति हो या हम ऐसे लोगों का अपने बहुमूल्य वोट के माध्यम से चुनकर  भेजें जो इमानदार हों और अपने को जनता का नौकर समझें |

Easy accessibility of a Lok Sevak is also very important for the healthy democracy. The author was reported that villagers make many trips to Tahsil or district head quarter to meet an officer to get their work done. This is basically because sometimes officers are busy in meeting or on leave or even absent without notice. This costs a villager a lot. There are many people in village who leave on daily income and if they loose that in making round for an officer to meet, you can imagine what would be their feeling. Only a person who has this experience can only realize. To avoid this, accessibility of an officer should be made certain. It must be ensured that there is always a customer service representative at each and every office controlled by government to hear the grievances of a customer and act on that. Also, this is the age of telecommuting. It should be made sure that an officer, minister, governor or elected public representative is easily accessible by e-mail, fax or telephone. He should make sure that each and very phone call is answered or each and every e-mail or fax is responded well. If a lok-sevak is too busy, his/her public relation representative should manage the telecommuting messages and should make sure for an appointment for telecommunication.  

 

A lok Sevak should never think he/she is not there to take a call of public or serve the public. Most of the lok sevaks think this way and that is not good for UP. If a lok-sevak thinks like that, he/she is not fit for the job or office and he/she should quit.  There are a lot of there in queue to pick up his/her job. In several such cases the author has observed that even public relation officers or secretaries in the offices of lok sevaks are trained to deny the accessibility of lok sevaks. They make excuses like lok sevak is in bathroom or eating or in a meeting or resting or sleeping or so on so forth. This is very dangerous for a democratic state and such an act must be avoided. If a lok sevak is available, he/she should be made accessible by his/her supporting officials to general public. Supporting staff should help in providing the accessibility rather than denying it. This could be achieved by political will and by casting intelligently the valuable vote.

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