उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव – 2007 के चुनाव परिणाम का विश्लेषण – Analysis of Results of UP Elections –2007

 

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव – 2007 के चुनाव परिणाम का  विश्लेषण प्रस्तुत करने से पहले मैं आपको यह बताना चाहूँगा की मैं किसी भी राजनीतिक पार्टी से सम्बद्ध नहीं हूँ और यहाँ पर पेश किया गया विश्लेषण पूरी तरह से निष्पक्ष  है | मैं किसी भी राजनीतिक दल को पसंद नहीं करता लेकिन किसी का विरोध भी नहीं करता | मैं मूल्यों पर आधारित राजनीति में विश्वाश करता हूँ | एक बार यदि आप राजनीति में घुस गए तो फिर एक आदर्श व्यक्ति रहना असंभव हो जाता है | लेकिन मैं राजनीतिज्ञों से कम से कम यह जरूर अपेक्षा रखता हूँ की वे मूल्यों और नैतिकता पर आधारित राजनीति को गले लगायें, जिसका की आज के अधिकांश राजनीतिज्ञों में अभाव है | 

 

इसमें कोई संदेह नहीं की बसपा सुप्रीमो ने सिर्फ अपने बल पर उत्तर प्रदेश में बहुमत प्राप्त कर एक सराहनीय कार्य किया है | यह वास्तव में बसपा सुप्रीमो के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है क्योंकि बसपा में उनके अलावा कोई ऐसा नेता नहीं है जो राष्ट्रीय स्तर पर जाना जाता हो | जबकि और दूसरे दलों में एक से अधिक ऐसे नेता हैं जो की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाए हुए हैं | वैसे तो पूर्ववर्ती सरकार ने अपने कर्मों से बसपा सुप्रीमो के जीत की इबारत लिख दी थी फिर भी इसके लिए बसपा सुप्रीमो को पूरा श्रेय दिया जाना चाहिए | 

 

मैं एक बात यहाँ बताना चाहूँगा की बसपा की लहर दो-चार सालों में नहीं बनी है | यह आन्दोलन सौ से अधिक सालों से चल रहा था लेकिन इस साल इसने मूर्त रूप लिया | दलित लोगों का यह उद्देश्य था की एक दलित इस देश पर पुराने राजा-महाराजों की तरह राज करे, न की आम जनता का सेवा करे, ताकि उन पर किये हुए राज और अत्याचार का बदला लिया जा सके और इसलिए दलित लोगों ने एकजुट होकर मतदान में भाग लिया और बसपा को मतदान किया | सर्वेक्षण के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश में इस साल ४५% लोगों ने वोट किया जिसमें से ४५-५५% संख्या दलितों लोगों की थी जिनका इस बात से कोई सरोकार नहीं था की उत्तर प्रदेश में गुणवत्ता-पूर्वक सेवा करने वाली सरकार बने, बल्कि उनका सिर्फ एक ही मकसद था की दलित की सरकार इस बार राज करे |  वोट डालने वाले ४५-५५% दलित लोगों में से ३२% लोगों ने बसपा को मतदान किया | इस साल लगभग ५५% ऐसे लोगों ने मतदान नहीं किया जो हमेशा ही एक अच्छे सरकार की कामना रखते हैं, लेकिन वोट डालने नहीं जाते हैं | इसके अलावा पूर्ववर्ती सरकार की करनी की वजह से कुछ सुविधायुक्त (अगड़ी जाति) और वंचित (पिछड़ी जाति) लोगों ने भी बसपा को मतदान किया | मैं इस चर्चा में जाति-पाति का कहीं भी उल्लेख नहीं करना चाहता अतः मैंने भारत के नागरिकों को तीन श्रेणियों: सुविधायुक्त, वंचित एवं दलित   में वर्गीकृति किया है | हमने देखा है की उत्तर प्रदेश में चाहे किसी भी पार्टी की सरकार क्यों न बनी हो, वे वंचित एवं दलित  समुदाय के लोगों के लिए जरूर कुछ न कुछ किये हैं, अतः मुझे नहीं पता की क्या बसपा उनसे कुछ अधिक कर पायेगी |  मुझे यकीन है की बसपा के पक्ष में ध्रुवीकरण के लिए यह मुद्दा कोई कारण नहीं है | 

 

मिडिया ने जोर देकर लिखा है की यह एक अप्रत्याशित परिणाम था | हाँ,  यह एक अप्रत्याशित परिणाम था, लेकिन सोशल इंजीनियरिंग के वजह से नहीं, जैसा की अधिकांश मीडिया ने इसे बताया है, बल्कि यह सौ साल से अधिक से चले आ रहे आन्दोलन के वजह से था | सोशल  इंजीनियरिंग  दो महीने में में काम नहीं करता, वह भी चुनाव शुरू होने के कुछ दिन पहले से शुरू किया हुआ | बहुत सारे अखबारों ने बसपा के बहुत दिनों से चले आ रहे कुख्यात नारा, ‘तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ को कितने ही बार छापा है, तो चुनाव से कुछ दिन पहले नए नारे जैसे, ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ या ‘तिलक तराजू और तलवार, इनको पूजो बारमबार’ का जप करने से बहुत सारे सुविधायुक्त लोगों (अगड़ों) का दिल नहीं जीता जा सकता |  इसके अलावा भूत में बसपा सुप्रीमो द्वारा किये गए कामकाज की शैली से बहुत सारे लोग भलीभांति परिचित हैं | वह गठबंधन की सरकार चलाने में सक्षम नहीं थीं और वह तीन बार मिले अवसरों पर असफल हो चुकीं हैं | लेकिन उनके अतीत से यह बहुत साफ़ था की वह  अपनी सोच से किसी भी तरह का समझौता नहीं कर सकतीं और उनके अनुयायी भी इससे  भलीभांति  परिचित थे | इसीलिये बसपा के अनुयायीयों ने बसपा के सुविधायुक्त वर्ग के उम्मीदवारों को भी बड़ी मात्रा में वोट किया |  उन्हें पता था की बसपा के चाहे किसी भी वर्ग के प्रत्यासी को वोट दें, बसपा सुप्रीमो ही  उत्तर प्रदेश की बागडोर संभालेंगी और इसलिए दलित वर्ग का वोट सुविधायुक्त वर्ग के प्रत्यासियों को भी पूरा का पूरा मिला |  जादू चला और उसका परिणाम आज सामने है |  यह दलित वर्ग के वोट का पूरी तरह से बसपा के पक्ष में ध्रुवीकरण के कारण हुआ | 

 

आज उन ५५% सोये हुए मतदाताओं को जगाने की जरूरत है, जिन्होंने ने मतदान में भाग नहीं लिया | यदि ८०-९०% मतदाताओं का वोट पड़ा होता तो आज स्थिति कुछ और होती | यह सर्वविदित तथ्य है की बसपा हमेशा ही अपने मतदाताओं को यह कहकर प्रेरित करती रहती थी की वोट के दिन को एक व्रत के रूप में लें और पोलिंग बूथ पर मतदान शुरू होने के पहले से ही पहुँच जायं और मतदान के अंत तक वहां डटे रहें | यह बसपा के काम आया और बसपा के अधिक-से-अधिक समर्थकों ने इसको वोट डाला | इस साल चुनाव आयोग का डंडा भी काम आया और बसपा को मदद किया क्योंकि कहीं भी बूथ कैप्चरिंग नहीं हुयी और दलित वर्ग के मतदाताओं को डरा कर बूथ से नहीं भगाया गया |

 

विभिन्न एजेंसियों द्वारा छापे गए तथ्यों के आधार पर हम यह कह सकते हैं की मतदान न करने वाले वोटरों में कम ही प्रतिशत उन वोटरों की थी जो बसपा का समर्थन करते थे और बसपा को वोट न कर सके, जबकि अधिकतर वोट न कर पाने वाले मतदाता दूसरे दलों के समर्थक थे |  चलिए हम अब इस परिदृश्य का विश्लेषण करते हैं की यदि ७०% मतदाता वोट दिए होते तो क्या होता ? इस चुनाव के परिणाम बताते हैं की ४०२ विधान सभा सीटों में से २७१ सीट ऐसे थे जहाँ प्रत्याशियों ने दस हज़ार वोट के कम अंतर से जीत हासिल की है | केवल १३१ सीट ऐसे थे जहाँ प्रत्याशियों ने दस हज़ार वोट के ज्यादा अन्तर से जीत हासिल की | अतः इस प्रकार से दो-तिहाई सीटों पर प्रत्याशियों ने कुल पड़े हुए वोट के १.५% या इससे कम के अंतर से जीत हासिल किया | अब इसकी चर्चा नीचे वृतांत में करते हैं |

 

उदहारण के तौर पर मान लें की –

 

(१) निर्वाचन क्षेत्र का नाम: क

 

(२) निर्वाचित उम्मीदवार का नाम: ख

 

(३) रनर-अप का नाम: ग

 

(४) ‘क’ में कुल मतदाताओं की संख्या: ४,००० (मान लें)

 

(५) मतदाताओं की संख्या जिन्होंने मत डाले: १,८००  (क्रमांक-४ का ४५%)

 

(६) निर्वाचन क्षेत्र ‘क’ में और मतदाताओं को वोट डालने के लिये प्रेरित किये जा सकने की संख्या: १,००० (यह मान

 

लें की क्रमांक-४ का २५% और मतदाता प्रेरित करने पर वोट दाल सकते थे, ताकि वोट डालने वाले मतदातों की संख्या कुल  वोट का ७०% तक लाया जा सके)

 

(७) वोटों का अंतर जिससे ‘ख’ जीता: २७  (क्रमांक-५ का १.५%. रिपोर्ट के अनुसार विजेता और उपविजेता के बीच

 

 वोटों का अंतर 1.५%था)

 

(८) ‘क’ में दलित श्रेणी के मतदाताओं की संख्या जिन्होंने वोट डाले: ८१० (क्रमांक-५ का ४५%. रिपोर्ट के अनुसार

 

कुल डाले गए वोट में दलित लोगों द्वारा डाले गए वोटों की संख्या ४५% थी)

 

(९) ‘क’ में बसपा के पक्ष में ध्रुवित हुयी दलित वोटों की संख्या: २६० (क्रमांक-८ का ३२%. रिपोर्ट के मुताबिक़ ४५%

 

 डाले गए दलित वोटों में से ३२% बसपा के पक्ष में पड़े)

 

(१०) वोटों की संख्या जो बसपा और अन्य दूसरे दलों में बाँट गए: १,५४० (क्रमांक-५ में से क्रमांक-९ को निकालकर)

 

उपर्युक्त विश्लेषण से यह विदित होता है की उम्मीदवार ‘ख’ ने निर्वाचन क्षेत्र  ‘क’ में उम्मीदवार ‘ग’ से २७ वोटों से जीत हासिल की | चलिए अब यह देखते हैं की यदि १,००० (ऊपर के क्रमांक ६ से) अतिरिक्त सोये हुए वोट पड़े होते तो क्या होता ? चूँकि अधिकतम संख्या में दलित वोट पड़ चुके थे अतः रिपोर्ट के अनुसार ‘क’ के कुल मतदाताओं में से सिर्फ ५-१०% सोये हुए दलित वोट ही नहीं पड़ पाए |  एकत्र किये गए आकंड़ों के आधार पर हम यह कह सकते हैं की अधिकांश सोये हुए दलित मतदाताओं में से अधिकतर वे मतदाता वोट नहीं कर पाए जो बसपा के जगह दूसरे दलों को वोट डालते | इस प्रकार यहाँ हम यह मान कर चल रहें हैं की सोये हुए सभी वर्ग के मतदाताओं में से सिर्फ २०% ही और वोट बसपा को मिल सकता था |   

 

(११) ‘क’ में बसपा को अतरिक्त वोट पड़ने की संख्या: २०० (क्रमांक-६ का २०%.  यहाँ हम यह मान रहे हैं की सोये हुए

 

वोटरों से अतरिक्त पड़ने वाले १,००० वोटों में से १०% दलित श्रेणी और १०% दूसरे श्रेणी से वोट पड़े होते)

 

(१२) अतः ‘क’ में बसपा को २०० (क्रमांक-११) अधिक वोट पड़ने के वजह से बसपा के जीत का अंतर: २२७ ( ऊपर के

 

क्रमांक-११ और क्रमांक-७ को जोड़कर)

 

(१३) उन वोटों की संख्या जो दूसरे दलों में बंटी होतीं: ८०० (ऊपर के क्रमांक-६ से क्रमांक-११ को घटाकर) 

 

चूँकि ऊपर के क्रमांक-१३ से ८०० वोटों की संख्या तीन प्रमुख पार्टियाँ सपा, भाजपा और कांग्रेस में बंटती, अतः प्रत्येक को अतरिक्त २६६ वोट पड़ते | अतः ‘ग’ को २६६ और अधिक वोट पड़ते | यदि हम इस संख्या को ऊपर के क्रमांक-१२ में संख्या २२७ से तुलना करें तो यह २६६ से ३९ कम है | इसका मतलब यह हुआ की जो प्रत्यासी ‘ग’ दूसरे नंबर पर था वह  सपा, भाजपा या कांग्रेस का होता और वह सोये हुए वोटरों से वोट मिलने  पर बसपा के प्रत्यासी से ३९ वोटों के अंतर से जीत गया होता | इस मामले में जीतने  का यह अंतर १.४% होता ([३९/{ऊपर के क्रमांक-५ और क्रमांक-६ का योग}]*१००) | 

इस विश्लेषण का सार यह है की बसपा ने अधिकतम सीटें बहूत ही कम अंतर से जीती है और इस जीत का मुख्य कारण सोशल इंजीनियरिंग  न होकर बसपा के पक्ष में दलित वोटों का ध्रुवीकरण है | इस जीत का श्रेय उन लोगों को भी जाता है जो की वोट नहीं करते हैं,  लेकिन एक अच्छे  प्रशाशन की कामना रखते हैं |

Before presenting the analysis of results of UP election – 2007, I would like to let you know that I am not associated with any political parties and analysis is unbiased. I don’t favor or oppose any political party and I believe in value based politics. Once you are in politics, you can’t be an ideal. But, at least I expect from politicians to practice values and morals (honesty, integrity, politeness/humbleness, quality services to public, respectability and accountability towards public, non-criminalization etc) based politics, which are lacking nowadays in most of them.

There is no doubt in saying that the Bahujan Samaj Party (BSP) supremo has done a commendable job by getting a majority in UP by her own. This is really a great achievement for her, since BSP supremo is only one in her party well known at national level. All others in BSP are not as known as many others of various parties of national and international repute and crowd pullers. The base of this victory was already cemented by many of BSP supremo’s predecessors, but anyways, full credit goes to her only.

I would like to make a point here that BSP wave is not built in couple of years but this movement was running since more than 100 years and it has only materialized this year.  It was goal of underprivileged (Dalits) to see an underprivileged rule the country and for that reason they united this time and voted in chunk to BSP.  Also, the survey shows that average voting in UP was about 45%, out of which 45-55% were franchised by mostly underprivileged voters, whose sole aim was not to bother about quality of government but to lodge a government ruled by an underprivileged. I, personally, don’t see anything wrong in this. BSP got 32% of total franchised (45-55%) votes of people of underprivileged category. An average of 55% voters didn’t vote which consists of the voters with vision for quality governance. Also, few privileged (Kshatriya, Vaisya, Brahman) and unprivileged (other backward classes) voted to BSP because of ant-incumbency factor. I don’t want to refer castisem anywhere in my discussion therefore I have categorized the citizens of India basically in three categories: privileged, unprivileged and underprivileged. It has been seen that almost every party, which was in power in UP, has more or less done for the benefits of people of unprivileged category but I am not sure, if BSP could do any more or better than that. I am sure this could not be the reason for the polarization.

Media emphasize that this was an unexpected result. Yes, it was an unexpected result, but not because of social engineering as most of the media elaborate, but because of more than 100 years of movement. A social engineering can’t work in couple of months and that is too just before the elections. As many news papers reported about the BSP’s infamous slogan “Tilak, Tarazu aur Talwar, Inko maaro jutey chaar” and then just before the election chanting of “Haathi nahin Ganesh hain, Brahma, Vishnu, Mahesh hain”  or “Tilak, Tarazu aur Talwar, Inko Pujo Barambaar” can’t covert the hearts of many. Also, many know the functioning style of BSP supremo based on her past and pending cases of corruption against her. She wasn’t capable to run the coalition government and she was failed on three occasions. But it was clear from the past that she can’t compromise on the cause on which BSP was formed and her follower knew this very well. Therefore they voted in chunk even to candidates of privileged category of her party. They knew that that BSP supremo will be ruling the UP, if BSP comes to power and thus the votes of underprivileged category get transformed to votes for the candidate of privileged category. Magic worked and we saw the result. This is the result of pure polarization of votes of unprivileged category.

There is need to mobilize the 55% of sleeping voters which didn’t vote. If 80-90% of voters would have voted, the situations could have been something else. It is known fact that the BSP was continuously motivating its vote bank stating them to consider the voting day as veneration/pious day and be there at polling booth from the beginning of the start of the polling. This helped the BSP and maximum of its supporters voted to BSP. The election commission also played a great role this time and it helped BSP, since there was no booth capturing or intimidation to the underprivileged category voters at any place.

Based on the facts reported by various agencies, we can say that there was only little percentage of sleeping/left-out voters who couldn’t vote to BSP. So, let us analyze the scenario, in case if 70% (possible assumption) of voters would have voted in this election. The results show that there were about 271 seats out of 402 where the candidates won the election with the margin less than 10,000 votes. There were only131 seats where the difference of votes was more than 10,000. Thus, there are about two third of seats where the candidates were declared elected by the margin of 1.5% of total casted votes. Let us discuss the scenario here:

(1) Constituency Name: C

(2) Elected candidate’s name: E

(3) Runner-up’s name: R

(4) Number of voters in C: 4,000 (assume)

(5) Number of voters casted their votes in C: 1800 (45% of (4))

(6) The voter could have been mobilized to vote in C: 1000 (assume 25% of (4) to make 70% voting target)

(7) Margin of votes with which E won in C: 27 (1.5% of (5). As per the reports, the difference of votes between winner and runner-up was 1.5% in most of the cases)

(8) Number of votes casted by underprivileged category in C: 810 (45% of (5))

(9) Number of polarized votes to BSP in C: 260 (32% of (8))

(10) The votes which are divided in BSP and others in C: 1540 ((5) – (9))

So, from the above analysis, we can say that E won the election in C by 27 votes. Now let us see what happens, if additional 1000 (25% more of Total number voters in C) sleeping voters would have franchised their votes. Since most of the voters of underprivileged category have already voted in C, so, there could have been leftovers of only 5-10% of them who could have not voted in this election. Based on statistics collected from various reports, it is possible to derive that the most chunks of the sleeping voters would have gone to other parties rather than the BSP in C. Therefore, I assume here that the BSP would have got about 20% additional votes of sleeping voters.

(11) BSP’s additional votes in C: 200 (20% of (6). Assume all the voters of underprivileged category who missed to vote would vote to BSP with additional 10% from the other category.)

(12) BSP’s lead would have been in C: 227 ((11) + (7))

(13) Number of votes which would have been divided in others in C: 800 ((6)-(11))

Since we have three major parties (SP, BJP and Congress) to share the bulk of the sleeping votes, let us divide the number in (13) by 3. Thus each one will get additional 266 votes. If we compare this number with the number in (12), it is clear that the runner-up would have got 39 votes more than the winner and in that case the runner-up would have won the contest. The margin of votes for winning in this case would have been 1.4% ([39/ {(5) + (6)}] x100).

The conclusion of this analysis is that the BSP won a large number of seats with very small margins not because of social engineering but because of polarization of votes of underprivileged category and most of the visionary of good governance didn’t take part in franchising their votes.

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6 Responses to “उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव – 2007 के चुनाव परिणाम का विश्लेषण – Analysis of Results of UP Elections –2007”

  1. B Shantanu Says:

    Great analysis, Vinaya…
    Unfortunately the reality is that caste (and casteism) was a very important factor in UP elections…but the way out is probably to have more of the “sleeping” (apathetic, indifferent) voters come out and participate rather than work on complicated caste calculations.

    Have a look at my latest post where I have included your analysis:
    http://satyameva-jayate.org/2007/05/20/up-elections-analysis/

  2. Vinaya Singh Says:

    Dear Shantanu,

    Thank you very much for your appreciation. I agree with your comments. I looked at your latest post and it is really a nice collection of post election analyses. Also, I am regular reader of your blog and I appreciate your writing.

    Thanks & Regards,
    Vinaya

  3. Ajay Sharma Says:

    Hi Friends,

    By showing the comparison you have definately brought something which everybody
    is already aware off.But still a good job.the problem is we all understand such
    things and infact even show concern but donot have the courage to bring the much
    required “change”.
    i believe all this can be change only if we change our
    mindset.which will never happen.Why?
    Because Indian’s are like such only.it’s a Racial problem.
    However it doesn’t mean that we should not even try.important is not to achieve
    what you want but to follow the right path.
    “Dyar ae jaur me rasta hai ak he warna ,kise pasand tha ali dil ke sair ae dar
    kare”

    Ajay Sharma.

  4. Vinaya Singh Says:

    Dear Ajay,

    I think your comments were intended to this article but it was placed at other. I moved it here.

    I appreciate you for you comments and suggestions. S. N. Singh Welfare & Education Society is working on your concerns and it is in continued dialogue with political parties, lok-sevaks and public. The Society needs support from people like you.

    Thanks & Regards,
    Vinaya

  5. Mahesh Patil Says:

    Hello Vinaya, nice to read and understand your analysis of UP polls,

    I totally agree with your last para. I guess that sums it up. And the guys boasting good governance will need some time to get out and caste their vote due to lack of options.

    Regards,
    Mahesh Patil
    Bharat Punarnirman Dal
    9320009697

  6. Vinaya Singh Says:

    Dear Mahesh,

    Nice to hear you and thanks for you comments. The members of S. N. Singh Welfare & Education Society are going to the public and making them aware how important their votes are. The society is also making them know their rights and the benefits of the true democracy. It is also involved in decimation of information on good governance reported here to chief ministers, governors, lok-sevaks and government officials, and asking them to provide the democratic services due to the people of India. The society is looking forward for the support of general public.

    Thanks & Regards,
    Vinaya

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