आज भी ब्रिटिश राज – On “British Rule” – by Dr. Vinaya K. Singh, Ph.D.

लेखक एक गाँव में ही पढ़-लिख कर बड़ा हुआ और वह गाँव के लोगों की  दयनीय स्थिति को अपने आखों से देखा एवं जीया है | वह उत्तर प्रदेश की आज की प्रशासनिक व्यवस्था का ध्यान -पूर्वक अध्यन करने के बाद पाया की यह व्यवस्था आज भी अंग्रेजी हुकूमतों की व्यवस्था पर आधारित है और उसी की तरह ही काम करती है | एक दोष-रहित प्रजा-तंत्र में किसी देश की जनता, उनपर किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा  राज करना पसंद नहीं करती | प्रजा-तंत्र में जनता ही ऐसे लोगों को चुनकर एक सरकार बनाती  है, जो उनपर राज न करके उनकी सेवा करे |  इस तरह से प्रजा-तंत्र में किसी देश की पूरी जनता ही अपने ऊपर राज करती है, न की कोई विशेष व्यक्ति |  भूत में अंग्रजी हुकूमत विशेष व्यक्तियों की विभिन्न पदों  पर नियुक्ति  कर भारत की  जनता को नियंत्रित  कर  उनपर राज करती थी |  पदों पर नियुक्त लोग भारतीयों की निगरानी एवं उनपर राज करते थे न की उनकी मदद या सेवा करते थे | वे हमारे लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार करते थे और उन्हें अपना गुलाम समझते थे | उन पदों पर बैठे व्यक्ति चाहते थे की जनता उन्हें अपना मालिक समझे और उनका सम्मान करे, जबकि हमारी जनता के साथ वे निरादर भाव से एक नौकर जैसा व्यवहार करते थे |  वो चाहते थे की उन्हें साहब, महामहीम, श्रीमान, हाकीम, राजासाहब, श्रधेय, मेरे भगवान्, सम्माननीय  एवं माननीय जैसे उपाधियों से पुकारा जाय | वही संकल्पना  आज भी उत्तर प्रदेश में लागू है | आज के बहुतायत में सरकार के मंत्री एवं लोक-सेवक अपने आप को सेवक न समझकर, राज करने वाले  एवं सम्मानित व्यक्ति महसूस करते हैं | वे  अपने आप को जनता का नौकर नहीं मानते और वो वहां उस पद पर जनता की सेवा के लिए नियुक्त हैं, यह नहीं समझते | वो अपने आप को आम जनता से ऊपर एक विशिष्ट व्यक्ति का दर्जा देते हैं और चाहते हैं की आम जनता उन्हें अपना मालिक समझकर उनके साथ इज्जत से पेश आये |

एक त्रुटिहीन प्रजा-तंत्र में उपर्युक्त सोच के लिए कोई जगह नहीं है |  लेखक एक हिंदी अखबार में पढ़ा था की राज्य का एक मुख्य-मंत्री अपने आपको भगवान् समझता था | वह जिस भी सभा में जाता था, लोगों से बोलता था की जो भी मांगना  है मांगो, वो उनकी ख्वाहीश पूरी करेगा |  ऐसी सोच, प्रजा-तंत्र के लिए घातक  है | एक मुख्य- मंत्री की सोच एकदम से इसके विपरीत होनी चाहिए |  एक मंत्री की यह सोच होनी चाहिए की वो जनता का सेवक है और उसके मन में यह भाव कभी नहीं आना चाहिए की वो एक विशिष्ट व्यक्ति है और उसका दर्जा आम जनता से ऊपर है | इसके उल्टा, उसकी सोच यह होनी चाहिए की आम जनता ही उसके लिए विशिष्ट व्यक्ति है और वही  उसका सही अर्थों में मालिक है |  यदि वे ऐसी सोच न रखें तो आम जनता ऐसे लोगों को चुनकर न भेजे ताकि उन्हें ऐसे पदों पर आसीन होने से रोका जा सके |  यह पूरी तरह से आम जनता के हाथ में है और इसे ही प्रजा-तंत्र कहते हैं जहाँ आम जनता ही प्रदेश पर शासन करती है |  प्रजा-तंत्र में आम जनता ही एक ऐसे सरकार का गठन करती है जो आम जनता के लिए एक नौकर के रूप में काम कर सके |

प्रजा-तंत्र में संवैधानिक पदों का निर्माण कर उस पर कर्मठ, जिम्मेदार, इमानदार एवं नैतिकता-युक्त  लोगों की नियुक्ति की जाती है तथा संवैधानिक अधिकार के साथ अच्छी तनख्वाह भी दी जाती है ताकि लोगों की सेवा अच्छी तरह से कर सके | इन पदों तक भ्रष्ट लोगों को पहुँचने से रोकना चाहिए नहीं तो प्रजा-तन्त्र चरमरा जाएगी और अच्छा जीवन-यापन के लिए लूट-खसोट की प्रवृति बढ़ने से लोगों का विश्वास एक दूसरे से उतरने लगेगा | इन पदों तक पहुंचना आसान नहीं होता और केवल काबिल और मेहनतकश लोग ही पहुँच सकते हैं लकिन इसका यह मतलब नहीं हुआ की इनका दर्जा आम लोगों से ऊपर हो गया | लोग इन पदों के लिये अपनी मर्जी से निवेदन करते हैं और वो खुद से सेवा करना चाहते हैं | उन्हें जबरदस्ती नहीं बैठाया जाता | लेकिन ज्यादातर लोग इन पदों तक पहुँचने के बाद प्राप्त अधिकारों के तहत  अहम् में आ जाते  हैं और यह भूल जा रहे हैं की वो आम जनता  के नौकर हैं | यदि उस पद पर पहुँच कर कोई यह सोचता है की वो जनता का नौकर नहीं है तो उसे स्वेच्छा से पद छोड़ कर कोई और या मजदूरी का काम कर लेना चाहिए | यदि ऐसा नहीं होता तो आम जनता को प्रजा-तंत्र का राम-बाण  यानी अपने वहुमुल्य वोट का अधिकार कर ऐसे लोगों से छुटकारा पा लेना चाहिए | 

भारत सरकार द्वारा लोक-सेवा आयोग का गठन इसीलिए हुआ  था की कुशल  एवं सक्षम लोक-सेवकों (आई. ए.  एस./आई. पी. एस.  इत्यादि ) को   चयनीत कर लोगों की सेवा के लिए समर्पित  किया जाय, लेकिन आज-कल लोग इसमें सेवा करने की भावना से कम और वैध   या  अवैध  रूप से राज करने का अधिकार, इज्जत और  पैसा अर्जित करने की भावना से ज्यादा जा रहे हैं |  ऐसा इसलिए हो रहा है की उत्तर प्रदेश का प्रजा-तंत्र त्रुटी-पूर्ण होने के वजह से आम जनता इन लोक-सेवकों के क्रिया-कलापों को नियंत्रित नहीं कर पा रही है और उनके भ्रष्ट कार्यों के लिए एक नियत समय में उन्हें सजा दिला पाने में असमर्थ है | इस तरह से हम पुराने ब्रिटिश राज को ही ढो रहे हैं |  इसीलिये आज नव-युवकों में आई. ए.  एस./आई. पी. एस./ मंत्री  इत्यादि बनने के लिए उन्माद है | यदि यह लागू हो जाय की इन पदों पर हमें वास्तव में जनता के नौकर के तरह काम करना है और प्रतिष्ठा, नाना प्रकार की सुविधाएं और विशिष्ट व्यक्ति का दर्जा नहीं मिलने वाला है तथा भ्रष्ट लोगों के कर्मों की सजा तुरंत मिलने वाली है तो इस काम के लिए वही लोग आवेदन करेगें जो की बेरोजगार हों या जिन्हें जबरदस्ती ऐसे पद को सौंपा जाय या जिनका वास्तव में एक मात्र उद्देश्य लोगों की सेवा करना हो | और यदि ऐसा हुआ तो सही माईने में उत्तर प्रदेश में प्रजा-तंत्र होगा और प्रदेश का विकाश होने के साथ-साथ अन्य लोग भी सुखी एवं संपन्न होंगे | लेखक को आज यह नहीं मालूम की कितने मंत्री, राज्यपाल, लोक-सेवक (आई. ए.  एस./आई. पी. एस. इत्यादि) इत्यादि अपने को जनता का नौकर समझते हैं और आम जनता को साहब, महामहीम, श्रीमान, हाकीम, राजासाहब, श्रधेय, मेरे भगवान्, सम्माननीय  एवं माननीय जैसे उपाधियों से पुकारते हैं | यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो हम समझते हैं की हम अभी भी ब्रिटिश हुकूमत में जी रहे हैं |

प्रजा-तंत्र में आम जनता की यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी बनती है की वो अपने वोट के अधिकार के माध्यम से ऐसे लोगों का चुनाव करे जो हमेशा ही उनकी सेवा में तत्पर हों | यह काम आम जनता के पूरे अधिकार क्षेत्र में है और इस अधिकार का उपयोग भ्रष्ट लोगों का चयन कर जाया नहीं करना चाहिए | यदि हम अपने घर के  नौकर या अपने प्राइवेट कंपनी में किसी कर्मचारी का चयन करते हैं तो किस तरह से उसे ठोक-बजा कर हर कोण से देखते हैं की वो काम के लिए कुशल है की नहीं | क्या हम ऐसा अपनी सेवा करने वालों को चुनने के लिए नहीं कर सकते ? यदि हम चुनाव के समय एक अच्छे लोक-सेवक को चयनीत कर भेजते हैं तो वह अवश्य ही सरकारी संस्थानों में सच्चे लोक-सेवकों की नियुक्ति करेगा जो त्रुटी-हीन प्रजा-तंत्र के मुताबिक़ सिर्फ आम जनता की भलाई के लिए काम करेगा |

लेखक एक लोक-प्रिय अखबार में पढ़ा की उत्तर प्रदेश की आई. ए.  एस. एसोसिएसन  यह नहीं चाहती की सूचना आयोग एक आई. ए.  एस. को तलब करे क्योंकि इससे उसकी प्रतिष्ठा और अहम् को आंच आएगी | यह एक त्रुटी-पूर्ण प्रजा-तंत्र एवं ब्रिटिश हुकूमत की गुणवत्ता है जो उत्तर प्रदेश में घटित हो रहा है | हमारे लोक-सेवकों की सोच आज भी राजा-महराजाओं की तरह है जो अपने को आम जनता का नौकर समझते ही नहीं और हमें एक स्वस्थ्य प्रजा-तन्त्र के लिए इस तरह के सोच को बदलवाने के लिए कार्य करना पडेगा |  यह तभी संभव है जब उत्तर प्रदेश की जनता और राजनीतिक पार्टियों में इच्छा-शक्ति हो और आम जनता की कल्याण के लिए हिम्मत जुटा कर इस तंत्र में बदलाव करने की कोशिश हो | तभी उत्तर प्रदेश को एक दोष-रहित प्रजा-तंत्र में बदला  जा सकता है और बीते सालों से छनकर आ रही ब्रिटिश राज का खात्मा हो सकता है |

 

The author has grown up in a village and he has seen the pitiable condition of the villagers. He has analyzed the administrative system carefully and found that the system is still based on the British rulers. The faultless democratic system is a system where public doesn’t like any one ruling them. The public forms government for not to rule but to take care of state or country. So, the whole public in all is ruler but not the individuals. In past, British ruled India by appointing officers at the different levels. Those officers were basically involved in monitoring the public and ruling them. They were there not for helping or serving the public. They were treating the general public inhumanly and came up with relation called master and servant. Those officers wanted themselves to be treated as the master (malik) by the general public and were trained to look on general public as servant (gulam) with disrespect. They preferred to be called by the words like Your Excellency, Sir, Hakim, Your Majesty, Reverend, Your Honor, Me Lord, Mahamaheem, Honorable etc. The same concept still carries. Most of the ministers and bureaucrats have in mind that they are rulers and respectable. They don’t think they are public servants and they are there to serve the people.  They think they are Very Important Person (VIP) and they should be respected.  

 In a true democratic system, there is no place for such thinking.  The author read in a popular Hindi news paper that one of the chief ministers of a state was behaving like a God. He was asking few people gathered around him on some occasion to beg for whatever they need and he will fulfill their wish. Such kind of mentality is dangerous to democracy. It should be opposite. A minister should think as he/she is servant of public and rather than he/she being a VIP, the general public is VIP. If they don’t think like that, public should not allow them to reach that level. This is absolutely in hand of the public and that is what called democracy, where a state is ruled by the public. In democratic system, a government is formed by the public for the service of the public.  

 

The public service commission (Lok Seva Ayog) is established by government to provide efficient and capable public servants (Lok Sevaks) to serve the people but most of us want to join that because of not serving the people but to get power to rule the public. Therefore there is craze to become Indian Administrative Service (IAS) officer, Indian Police Service (IPS) officer, minister etc. If we really imagine we have to work as servant of public and not as VIP, only those of us can opt for this job whose real aim is to serve the public. The author is not sure how many of ministers, governors and bureaucrats (let’s call them as lok-sevaks in future references) think themselves that they are servants of public and they should use words like Your Excellency, Me Lord, Your Honor, Sir, Hakim, Your Majesty, Reverend, Mahamaheem, Honorable etc for general public rather than expecting the same for themselves. It is a big responsibility of public to only elect those representatives who can really serve them. It is in their hand and they have power to do so by having an invaluable vote. If we appoint a domestic help or an employee in privately owned enterprise, we screen and check whether he/she is efficient from each and every angle. So, why can’t we do this in electing the representatives? If we elect right representative, he/she automatically would appoint a right officer in government organization.

The author read in a news paper that IAS association doesn’t want an IAS officer to be summoned by Information Commission (Suchana Ayog), solely because it could hurt his/her ego. That is a quality of faulted democracy. This is what happening in our state. Our officers’ mentality is of get treated like a master (Malik) and not as a servant, and we need a will to change this mentality. This can only be achieved by public and political parties who have a will to change the system for the welfare of the public to make UP truly democratic. 

Here are some reports on Indian democracy:

Indians world’s most undemocratic people

One Response to “आज भी ब्रिटिश राज – On “British Rule” – by Dr. Vinaya K. Singh, Ph.D.”

  1. S. N. Singh Welfare & Education Society and its Mission « How to transform Uttar Pradesh (UP) into Uttam Pradesh (Best State) Says:

    […] On “British Rule” – by Dr. Vinaya K. Singh, Ph.D. […]

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