समानता का अधिकार – On “Equality” – by Dr. Vinaya K. Singh, Ph.D.

 

लोकतंत्र के मुख्य सिद्धांतों में से एक है  – सभी नागरिक समान हैं |  एक राज्य का विकास तब तक नहीं हो सकता जब तक की जीवन के हर पहलू में  प्रत्येक नागरिक के साथ समान रूप से व्यवहार नहीं किया जाता | समानता को दो भागों में बांटा जा सकता है  – सामाजिक या  लिंग आधारित |  यदि कोई किसी राज्य के राज्यपाल पद पर हो या कोई रिक्शा चालक ही क्यों न हो, सरकारी संस्थाओं द्वारा दोनों के साथ समान रूप से व्यवहार किया जाना  चाहिए | उन दोनों के बीच कोई अंतर नहीं है |  राज्यपाल रिक्शा चालक जैसे अन्य आम नागरिकों की सेवा की अपनी जिम्मेदारियों को ढो  रहा है जबकि एक रिक्शा चालक आम जनता को गतिशीलता प्रदान कर अपना काम कर रहा है| उनके बीच अंतर सिर्फ आय का है | राज्यपाल की जिम्मेदारी एक राज्य के सारी जनता का सेवा करना है जबकि एक रिक्शा चालक सीमित लोगों में कार्य करता है, अतः राज्यपाल, रिक्शा चालक से अधिक धन कमाता है | लेकिन उनके पद के अनुसार उनमें कोई अंतर नहीं किया जाना चाहिए और प्रत्येक सरकारी एजेंसी द्वारा दोनों के साथ बराबरी का व्यवहार होना चाहिए |

 

लेखक को कई ऐसी घटनाएँ बताई गयीं जहां प्रभावशाली व्यक्तियों (विधायक, सांसद, नौकरशाह आदि) को आम जनता से ज्यादा वरीयता दी गई | एक व्यक्ति ने  अपनी एक कहानी बतायी कि जब वह पुलिस कप्तान के कार्यालय के बाहर एक कतार में कप्तान से मुलाकात कर अपनी शिकायत दर्ज करने के लिए इंतज़ार कर रहा था तभी एक स्थानीय विधायक अचानक वहां पर आ धमाका | विधायक का पुलिस कप्तान के साथ कोई पूर्व निर्धारित मुलाकात का समय तय नहीं किया गया था | पुलिस कप्तान के कार्यालय के सभी कर्मचारी विधायक के आव-भगत में जुट गए और उसे उसकी बारी के बाहर पुलिस कप्तान से मिलने की अनुमति दे दी गई |  इस प्रकार  कतार में इंतजार कर रहे अन्य व्यक्तियों की बारी आने में कई घंटे की देरी हो गयी और कुछ को मुलाकात किये बिना ही वापस लौटना पड़ा, क्योंकि पुलिस कप्तान के पास समय का अभाव था | सामान्यतया विधायक एक लोक सेवक है लेकिन उस समय समय लोक (जनता) की पीड़ा का परवाह नहीं किया | यह बेहतर होता अगर विधायक कतार में खड़ा होकर अपनी बारी के आने का इंतज़ार करता या पुलिस कप्तान के कार्यालय के स्टाफ उसको महत्व नहीं दिए होते |  इस घटना से यह पता चलता है कि उत्तर प्रदेश में कोई समानता का कानून नहीं है और एक व्यक्ति को उसकी पदवी  एवं स्टेटस के आधार पर सम्मान दिया जाता है | बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति (वीआईपी) शब्द सरकारी  शब्दकोश से समाप्त कर दिया जाना चाहिए |  एक लोकतांत्रिक राज्य में केवल आम जनता को वीआईपी कहलाने का अधिकार होता है न की सरकारी कर्मचारियों को | लेखक के अनुसंधान से पता चलता है कि उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति (जैसे विधायक, सांसद, आई.ए.एस, आई.पी.एस आदि) सिस्टम को इस डर से बदलना नहीं चाहते की आम जनता को बराबरी का अधिकार देने पर सम्मान, स्टेटस, और उनके राज करने का अधिकार खत्म हो जायेगा |

 

लेखक को एक घटना  याद है जब वह संयुक्त राज्य अमेरिका के पचास राज्यों में से एक राज्य में काम कर रहा था | लेखक के बेटी की हाई स्कूल द्वारा स्कूल की व्यायामशाला में एक समारोह आयोजित किया गया था | व्यायामशाला शिक्षकों, छात्रों और उनके माता-पिता/अभिभावक से खचाखच भरा हुआ था | वहाँ कई लोग  जगह की कमी की वजह से व्यायामशाला के फर्श पर ही बैठ गए थे |  लेखक यह देखकर दंग रह गया की ठीक उसके पीछे नग्न फर्श पर राज्य का शीर्ष अधिकारी,  राज्यपाल, अपनी पत्नी के साथ एक सामान्य व्यक्ति की तरह बैठा हुआ था, और तब लेखक को अमेरिका के  सच्चे लोकतंत्र  के स्वाद का एहसास हुआ | गर्वनर की बेटी उस समारोह में एक प्रतिभागी थी इसलिए वह उस समारोह में एक अप्रसिद्ध आदमी की तरह व्यक्तिगत तौर पर आया हुआ था | इसलिए उसे आम आदमी से बेहतर इज्जत एवं सम्मान नहीं दिया गया |  यह अलग बात है की समारोह के अंत में आयोजकों ने उसकी उपस्थिति के लिए राज्यपाल को धन्यवाद दिया और जब वह समारोह स्थल से जाने लगा तो बच्चे उसका आटोग्राफ लेने के लिए उसके पीछे भागे | हम भी उत्तर प्रदेश को ऐसी ही स्थिति में देखना चाहते हैं और लेखक हमेशा ही ऐसा होने का सपना देखता रहता है |

 

उपरोक्त उदाहरण समाजवादी समानता का एक पहलू है |  समानता का दूसरा पहलू है जब जाति, धर्म, अमीरी या गरीबी के आधार पर भेदभाव न हो | जातीयता एक राज्य की अखंडता के लिए बहुत खतरनाक है | हमें कुछ कड़े कानूनों की जरूरत है जिससे की जाति पर आधारित  भेदभाव  एवं  जातीयता को खत्म किया जा सके  |  अगर सरकार जरूरतमंद के उत्थान के लिए किसी संकुल (पैकज) को उपलब्ध कराने का फैसला लेती है तो यह जाति पर आधारित न होकर विशुद्ध रूप से वंचित एवं आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर होना चाहिए |  यदि हम जातीयता की समस्या को हल नहीं कर सकते तो हम कभी भी  समानता की प्राप्ति नहीं कर सकते, जो की एक सच्चे लोकतंत्र के स्तंभों में से एक है | आज आरक्षण अमीर, गरीब और दलित सबको बराबरी पर लाने के लिए आवश्यक है, लेकिन जाति शब्द को कहीं भी संदर्भित किये बिना | सरकार आरक्षण की नीतियों को वंचित, आभाव-ग्रसित और गरीब की मदद के लिए जारी रख सकती है और अगर आवश्यक हो तो आरक्षण कोटा  को गरीबों के अभावग्रसिटता या वंचिटता की डिग्री ( कम, मध्यम और उच्च )  के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित कर सकती है | इसके के साथ ही अत्यधिक वंचितों को स्नातक तक की नि:शुल्क शिक्षा प्रदान की जा सकती  है |  यह सरकार की जिम्मेदारी है की सबको बराबरी का हक़ मिले ताकि उत्तर प्रदेश को एक विकसित राज्य में बदला जा सके | यह आरक्षण रूपी उपकरण के माध्यम से गरीबों और वंचितों की मदद कर सबको सामान स्थिति में लाकर किया जा सकता है | यदि उत्तर प्रदेश का प्रत्येक नागरिक हर दिन की जरूरत की लागत वहन करने के लिए आत्मनिर्भर होने के साथ अपने भविष्य के लिए पैसे बचाने में  सक्षम हो जाता है  तो हमारा राज्य अपने आप ही एक उत्तम राज्य बन जाएगा |   

 

अब तक हमने समाजवादी ढांचे के आधार पर समानता पर चर्चा की |  अब हम लिंग आधारित समानता पर चर्चा करेंगे | पुरुषों और महिलाओं के बीच कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए | उत्तर प्रदेश के पिछड़ेपन का मुख्य कारण अधिकांश महिलाओं का पुरुषों पर निर्भरता  और इसके अलवा ज्यादातर महिलाओं का निरक्षर होना है | चूँकि उत्तर प्रदेश में साक्षर महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में बहुत कम है, अतः हमें इस समय उत्तर प्रदेश  में महिलाओं के संवर्धन के लिए नीतियाँ बनाने की जरूरत है |  आज ऐसे नीति कि जरूरत है जिसके तहत हम सभी महिलाओं को बिना उनके जाति या वर्ण के आधार पर  छात्रवृत्ति और मुफ्त शिक्षा प्रदान करें ताकि उन्हें सक्षम बनाने के लिए वे स्नातक स्तर की पढ़ाई बिना किसी रूकावट के पूरा कर सकें | इसके अलावा सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए की स्नातक की उपाधि प्राप्त सभी महिलाओं को काम या काम न मिलने पर उन्हें बेरोजगारी भत्ता या  अपना  स्वयं  का व्यवसाय शुरू  करने के लिए ब्याज-मुक्त ऋण मिल सके | जब तक एक औरत सम्पन्न नहीं बनती तब तक एक राज्य की प्रगति नहीं हो सकती और राज्य समृद्ध नहीं बन सकता |  हमें १००% महिलाओं को जितना जल्दी हो सके साक्षर बनाने के लिए लक्ष्य की जरूरत ताकि उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सके जिससे की उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश में बदलने में मदद मिल सके |

 

हमारे शोध से पता चलता है कि क्षेत्रियता के आधार पर उत्तर प्रदेश के विकास में असमानता है | हम पाते हैं कि कुछ क्षेत्र अविकसित हैं और कुछ क्षेत्र अन्य कि तुलना में कुछ ज्यादा ही विकसित हैं | क्षेत्रवाद और विभाजन को दबाने के लिए इस तरह के विकास से बचा जाना चाहिए | विकास समान रूप से वितरित किया जाना चाहिए और यह पक्षपात पर आधारित नहीं होना चाहिए | एक राज्य का हर नागरिक बराबर है और इसलिए क्षेत्र भी | यह देखा गया है कि मुख्यमंत्री या प्रभावशाली राजनेताओं से संबंधित क्षेत्रों की अन्य क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा विकास होता है | हमें हमेशा यह याद रखने की जरूरत है की उत्तर प्रदेश सिर्फ प्रभावशाली राजनीतिज्ञों के घर के शहरों तक ही सिमित नहीं है, वरन अन्य दूसरे क्षेत्र भी इसमें शामिल हैं, और इसके साथ ही उत्तर प्रदेश के राजनीतिज्ञों को क्षेत्रवाद की मानसिकता से बाहर निकलना चाहिए |  यदि इसका जल्दी ही ख्याल नहीं रखा गया तो क्षेत्रों के लिहाज से असंतुलन पैदा हो जायेगा जो क्षेत्रीय नागरिकों की भावनाओं को आहत कर  क्षेत्रीय मतभेद पैदा कर सकता है | इस प्रकार यह अंत में एक विद्रोह का रूप ले सकता है और अविकसित क्षेत्र के लोग एक अलग राज्य या यहाँ तक कि एक नए राष्ट्र के लिए मांग कर सकते हैं | ऐसी परिस्थिति से बचने के लिए सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए की राज्य के प्रत्येक क्षेत्र के लिए पैसे का समान वितरण हो |

 

कानून और व्यवस्था भी उत्तर प्रदेश वासियों पर समान रूप से लागू होना चाहिए, न की उनकी हैसियत या प्रभाव के आधार पर | यहाँ उत्तर प्रदेश में कई उदाहरण देखने को  मिल  जायेंगें जहां उत्तर प्रदेश पुलिस शक्तिशाली लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने से झिझकती है | यह मुख्य रूप से इसलिए है क्योंकि पुलिस उच्च स्तर के संवैधानिक पदों, जिस पर ज्यादातर बेईमान व्यक्तियों द्वारा कब्जा है, के हस्तक्षेप से डरती है | लेखक यहाँ अमेरिका में घटित हुयी एक घटना का उल्लेख करना चाहेगा जहाँ एक किशोरी एक राजमार्ग पर तय सीमा से अधिक की गति के साथ अपनी कार चला रही थी |  एक पुलिस वाले ने उसको  रोका और यातायात नियमों के उल्लंघन के लिए उसे टिकट दे दिया | बाद में यह पता चला कि यातायात नियमों के उल्लंघन के अपराध के लिए बुक की गयी लड़की और कोई नहीं बल्कि अमेरिका के विराजमान राष्ट्रपति की बेटी थी | इससे पुलिस अधिकारी को कोई फर्क नहीं पड़ा और उसने अपने कर्तव्य का निर्वाह विचलित हुए बिना किया |  जिम्मेदारी पूर्वक कर्तव्य प्रदर्शन के लिए उसे सार्वजनिक रूप से पुरस्कृत किया गया | कानून का यह मामूली सा उल्लंघन था और अगर पुलिस अधिकारी चाहता तो वह अमेरिकी राष्ट्रपति की बेटी को सजा दिए बिना ही जाने दे सकता था | लेकिन उसने ऐसा नहीं किया क्योंकि अमेरिका में कानून और व्यवस्था हर अमेरिकी नागरिक पर एक सामान रूप से लागू होता है, न की हैसियत या पदवी के अनुसार |  इसके अलावा, अगर पुलिस अधिकारी उसे टिकट नहीं दिया होता वह बाद में अमेरिकी कानून प्रवर्तन एजेंसियों के जांच पर गहरी मुसीबत में पड़ जाता |  यह उत्तर प्रदेश में भी हो सकता है यदि आम जनता इमानदार राजनीतिज्ञों को ही राजनीति करने के लिए चुने |

अंत में, धर्म के आधार पर उत्तर प्रदेश वासियों में भेदभाव नहीं होना चाहिए और सबके साथ एक तरह का कानून लगना चाहिए, चाहे कोई किसी भी संप्रदाय या धर्म से क्यों न हो | किसी को मिलने वाले सरकारी हक़  को उनके धर्म के आधार पर महरूम नहीं किया जाना चाहिए | एक धर्म के अनुयायीयों को वह सब अधिकार मिलना चाहिए जो किसी अन्य दूसरे धर्म के अनुयायीयों को मिलता है | धर्म पर आधारित सभी नियम, कानून एवं प्रक्रियाओं को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा निरस्त कर देना चाहिए | लोगों को यह स्वंत्रता होनी चाहिए की वे अपने पसंद एवं विश्वास के धर्म को गले लगा या उसका अनुपालन कर सकें, लेकिन हमें एक धर्म-निरपेक्ष समान नागरिक अचार सहिंता को लागू करने की जरूरत है जिसका हर धर्म के अनुयायी पालन करें | विभिन्न धर्मों के लिए विभिन्न कानूनों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए और आज समय की पुकार है की अतिशीघ्र धर्म पर आधारित कानूनों को समाप्त कर दिया जाय | आज कानून बनाने वालों को  इस विषय पर चिंतन-मनन करने की जरूरत है कि ऐसा कनून कैसे बनाया जाय  जिससे की लोग, चाहे किसी भी धर्म या संप्रदाय से क्यों न हों, लेकिन वे एक और केवल एक ही तरह के कानून का पालन करें |  यदि इस विषय को अभी हल नहीं किया गया तो धर्म के आधार पर प्रदेश को बांटने की आवाज़ उठ सकती है | यदि हम चाहते हैं की ऐसा नहीं हो तो इस पर तुरंत कार्रवाई करने की जरूरत है |

One of the main principles of democracy is equality. A state can’t be developed, if its citizens are not treated equally in every aspect of life. Equality could be socialistic or gender-wise. Both, a person on post of governor and a rickshaw puller, should be treated equally by government institutions. There is no difference between them. Governor is carrying his/her responsibilities of serving the people like rickshaw puller, whereas a rickshaw puller is doing his duty by providing mobility to public. The only difference among them is in the salary, since the governor’s responsibilities are to provide his/her services to whole public of state whereas a rickshaw puller serves limited ones. But, they should not be differentiated by their positions and should be treated equally by each and every government agency.

There were many incidents reported to the author where influential persons (MLAs, MPs, bureaucrats etc.) were given preference over general public. One person told a story that while he was waiting in a queue at office of SP to register his complaint, a local MLA suddenly appeared at the scene without having any prior appointment with SP. All the office staffs of SP’s then were diverted to welcoming the MLA and he was allowed to see the SP out of turn, and thus delayed the turn of other individuals by couple of hours. Generally speaking, an MLA is a lok-sevak, but that MLA didn’t care about the suffering of the loks (public) at that time. It would have been better; if either the MLA would have waited in queue for his turn or SP’s office staff would have not entertained him. This incident shows that there is no equality in UP and a person is being respected based on the position he/she holds. Very Important Person (VIP) word should need to be abolished from the government dictionary. Only the general public has right to be called VIP in a democratic state rather than the government servants. Author’s research shows that persons at high positions (like MLAs, MPs, IAS, IPS etc.) don’t want to change the system in fear of they would loose the respect and authority to rule.

The author remembers one instance when he was working in one of the fifty states of United States of America (USA). There was a function organized in the gymnasium of his daughter’s high school. The gym was packed with teachers, students and their parents/guardians, and there were many people sitting on the floor of the gym due to lack of space. The author was surprised to find that the governor, the head of the state, and his wife were sitting together on the naked floor, just beside him as general persons, and then the author realized the taste of the true democracy in US. The governor’s daughter was one of the participants in the function and his visit was a low profile personal visit in the function. Therefore he didn’t get any better attention than the general public. At the end of the function, the organizers thank the governor for his presence and when he was leaving the place, children rushed to him to get his autograph. We also would like to see UP in that position and author is always dreaming for that.

Above example is one aspect of the equality, the other is no differentiation based on caste (last name), religion, rich and poor.  Castiesm is very dangerous to integrity of a state. If the government decides to provide any packages to uplifting of needy, it should be made purely on the basis of economic backwardness rather than the caste. If we don’t resolve the castiesm problem, we may never achieve the equality, the one of the pillars of democracy. Reservations are required to make rich and poor equal, but without referencing the word caste. Government can have the reservation policies to help the poor, and if it is required, it can decide to have the quota of reservations divided into categories based on degree of deprivation/underprivilegement (low, medium and highly underprivileged) of the poor. With that, the highly underprivileged can also be provided with free education till their under-graduation.  It’s the government responsibility to make everyone equal to make UP a developed state. This could be done by helping poor using the tool of reservation to up-bring everyone to equal status. If each and every public of UP becomes self sufficient to afford the cost of daily need with able to save for his/her future, ours will automatically become a best state.

Till now we discussed the equality based on the socialistic framework. The next one is equality based on the gender of a person. There should be no differentiation between males and females. The backwardness of the UP is mainly because the major population of women is dependent on men and also the lack of illiteracy among them. Since women in UP are not yet as literate as men, there is need of hour to have women enrichment policies in our state. There should be policy to provide scholarships and free of cost education to all the women to make them capable to complete their under-graduation without fail, irrespective of their castes and creeds. Also, the government should make sure that all the graduated women get a job or unemployment allowances or interest-free loans to start their own businesses. Until a woman is enriched, a state can’t progress and prosper. We have to make our goal to achieve 100% literacy among women as soon as possible to make them sustainable and self-reliant to help transform UP in a best state.

Our research shows that there are inequalities in development of the state of UP region-wise. We find that some regions are underdeveloped and some regions are overdeveloped. This must be avoided to suppress the regionalism and division. Development should be equally distributed and should not be based on partiality. Every citizen of a state is equal and therefore the regions. It is observed that the chief minister’s or influential politicians’ belonging regions are being more developed than the other regions. We should keep in mind that UP is not only limited to home towns of influential politicians, but it contains many other regions too, and politicians should also overcome with the mentality of regionalism. If it would not be taken care of early, there could be misbalances regions-wise which may hurt the sentiments of regional citizens and may arose regional differences. Thus it may finally result into insurgencies and people of underdeveloped region may demand for a separate state, or even a country. To not to meet with such situations, the government should ensure the equal distribution of money to each region of the state.

Law and order should also be equally applied to residents of UP irrespective of their statuses. There are many instances observed in UP where police hesitated to take action against the powerful people. This is primarily because the police are afraid of high level constitutional positions, mostly occupied by dishonest persons. The author knows an instance occurred in US when a teenager girl was driving a car with the speed higher than the posted limit on a highway. A cop stopped and ticketed her for the traffic rules violation. Later it was revealed that the girl booked for the offence was none other than the daughter of the then president of US. It didn’t bother the cop to distract him from his duty and after this incident; he was publicly rewarded for responsibly performing his duty. The violation was minor and if cop would have wished, he could have let the daughter of US President go free, but he didn’t do so only because the law and order is equally applied to everyone in US. Also, if cop would have not ticketed her, he would have been found himself in deep trouble later by the law enforcement agencies in US. The same can also be possible in UP with the help of public allowing only honest politicians to practice.

Last but not the least, residents of UP should be treated equally, no matter what religions they belong to. They should not be singled out based on the religions they are practicing. Every one should get the same privileges that the people of other religion enjoy. All the religions based processes followed by government must be dropped or abolished. People should have freedom to embrace and practice the religion of their faith and choice, but we need a non-religion based uniform civil code that needs to be followed by all. There is no place for practicing different laws for different communities based on religions, and if there are such laws, the abolition of such laws is the most urgent need of the hour. People, irrespective of their religions, must follow one and only one code, and law makers need to work on the mechanics of this. If this is not addressed at this point of time, it’s possible that there could be voices for divisions of state based on the religions. If we want this no to happen, we need to act promptly. 

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One Response to “समानता का अधिकार – On “Equality” – by Dr. Vinaya K. Singh, Ph.D.”

  1. S. N. Singh Welfare & Education Society and its Mission « How to transform Uttar Pradesh (UP) into Uttam Pradesh (Best State) Says:

    […] On “Equality” – by Dr. Vinaya K. Singh, Ph.D. […]

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