कानून और व्यवस्था – On “Law and Order” – by Dr. Vinaya K. Singh, Ph.D.

 

कानून और व्यवस्था उत्तर प्रदेश की जनता की  सेवाओं  के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू है | आदर्श परिदृश्य में एक राज्य में ऐसा माहौल होना चाहिए की यदि एक व्यक्ति का सड़क पर बटुआ छुट जाता है तो उसे कोई नहीं चुराए या  यहाँ तक कि एक अकेली लड़की रात में स्वतंत्र रूप से बिना किसी डर के घूम सके |  इस तरह का परिदृश्य हम उत्तर प्रदेश के नागरिकों के लिए एक सपना है लेकिन उत्तर प्रदेश को एक रहने लायक जगह बनाने के लिए कानून और व्यवस्था की स्थिति में सुधार के लिए बहुत कुछ करना बाकी है |  बहुत सारे निवेशक उत्तर प्रदेश में निवेश करना चाहते हैं लेकिन कानून और व्यवस्था की बुरी हालत और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी सरकार के वजह से ऐसा करने में झिझक रहे हैं |  हम उत्तर प्रदेश में हत्या, अपहरण, बलात्कार, डकैती, भ्रष्टाचार आदि के मामले हर दिन सुनते हैं और लोग उत्तर प्रदेश सरकार की तुलना जंगल राज (जानवरों राज्य) से करते हैं, जहाँ जिसकी लाठी उसी की भैंस होती है और इन  सब के लिए किसी की भी जवाबदेही तय नहीं है ताकि  इन अपराधों की पुनरावृत्ति रोकी जा सके |

 

हमें पुलिस विभाग में हर स्तर पर किसी भी अपराध के लिए जिम्मेदारी तय करने की जरूरत है और कोई पुलिस अधिकारी अपने स्तर पर अपराध रोकने में नाकामयाब होता है तो उसे दण्डित करने की आवश्यकता है | यदि अधिकारीयों को यह डर घर कर जाय की उसकी अकर्मण्यता या भ्रष्ट करनीं पर दंड से बच नहीं सकता और उसकी नौकरी भी जा सकती है तो वह किसी असंवैधानिक दबाव के प्रभाव में नहीं आएगा और अपने कर्तव्य का निर्वाह इमानदारी पूर्वक करेगा |  निर्दोष व्यक्ति की हत्या एक जघन्य अपराध है और उत्तर प्रदेश सरकार का यह दायित्व है की वह ऐसा प्रबंध करे की प्रदेश में एक भी हत्या न हो |  यह तभी संभव हो सकता है जब किसी भी हत्या की वारदात के लिए सीधे उस जिले  के पुलिस कप्तान को जिम्मेदार माना जाय | हत्यारे को पकड़ने के लिए एक समय-सीमा तय कर देनी चाहिए और यदि उस तय समय में हत्यारा नहीं पकड़ा जाता है तो सीधे पुलिस कप्तान को दण्डित किया जाना चाहिए | यदि किसी जिले के पुलिस कप्तान के कार्यकाल के दौरान हत्याओं में एक सीमा से ज्यादा वृद्धि होती है तो पुलिस कप्तान को बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए | यदि इस तरह से पुलिस अधिकारीयों को अपराध के स्तर के अनुसार दण्डित करने का प्रावधान कर  दिया जाय और चूक होने पर अधिकारी किसी भी कीमत पर दंड से बच न सके तो उत्तर प्रदेश के हालात भी सामान्य हो सकते हैं और प्रदेश को विकाश के पथ पर मोड़ा जा सकता है |

 

इसके अलावा न्यायपालिका प्रणाली भी हमारे प्रदेश में इतना ईष्टतम और कुशल नहीं है जितना की एक लोक-तांत्रिक राज्य में होना चाहिए | हमारे यहाँ मुकदमों के मामले कई सालों से ठंढे बस्ते में पड़े हुए हैं | हमें न्यायपालिका के कामकाज में सुधार की आवश्यकता है ताकि न्याय देने की विधि को एक गति  प्रदान की जा सके और मुकदमों का निपटारा एक तय समय सीमा में हो सके | इससे न्यायिक मामले ज्यादा दिनों तक लंबित नहीं होगें और जरूरतमंद को जल्दी से न्याय देकर भ्रष्टाचार उत्पन्न होने से पहले ही इसे मारा जा सकता  है |  हम सबको मालूम है की न्याय में देरी का मतलब हमें न्याय से महरूम करना है जिसके वजह से भ्रष्टाचार और अन्य अनेकों प्रकार के अपराधों का जन्म होता है, और सरकार को यह पूरी कोशिश करने की जरूरत है की एक आम आदमी को न्याय आसानी और बिना देरी के मिल सके |  इसके लिए हमें अदालतों में बेंच और न्यायाधीशों की संख्या बढा तथा सूचना प्राद्यौगिकी का इस्तेमाल कर न्यायिक प्रणाली को कुशल बनाने की जरूरत है |  इसके अलावा सरकार को चाहिए की कुछ नए कानून बनाये जिसके तहत मुकदमों की गंभीरता के आधार पर उन्हें विभिन्न श्रेणियों में बाँट दिया जाय और हर श्रेणी के मुकदमे के निपटारे के लिए एक समय-सीमा तय कर दिया जाय | उदहारण के तौर पर चाहे कैसे भी हालात क्यों न हो, एक हत्या के मुकदमे पर फैसले के लिए अधिकतम एक साल का समय एक न्यायाधीश को दिया जा सकता है | यदि फैसला  दिए  गए समय के भीतर हो जाता है तो इसे  न्यायधीशों एवं जाँच एजेंसियों के एक अच्छे कार्य-कुशलता का पैमाना के तौर पर देखा जा सकता है और इस आधार पर उन्हें पुरस्कृति  किया जा सकता है | यदि फैसला सुनाने में तय समय-सीमा से अधिक का समय लगता है तो इस देरी के लिए न्यायाधीश एवं जाँच एजेंसी को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है और इसके लिए इन्हें दण्डित किया जा सकता है |

 

अधिकांश अमीर, प्रभावशाली या शक्तिशाली व्यक्तियों में यह धारणा घर कर ली है की उत्तर प्रदेश में नियम-कानून सिर्फ आम आदमी पर लागू होता है, उन पर नहीं |  इन लोगों को यह लगता है की चाहे वे किसी बड़े कानून का भी उल्लंघन क्यों न कर लें, उनके पैसे या प्रभाव के वजह से उन पर अपराध का मामला नहीं चलेगा या पुलिस उनको नहीं पकड़ेगी | यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि उत्तर प्रदेश के कानून व्यवस्था में बहुत सारी खामियां हैं |  आज हमें कानून व्यवस्था को स्वतंत्र बनाकर और शक्तिशाली बनाने की जरूरत है ताकि यह प्रभावशाली व्यक्तियों के लिए उदार न हो सके और यहाँ तक की मुख्य-मंत्री या उसका लड़का भी किसी तरह के कानून का उल्लंघन करे तो उन्हें सजा दी जा सके | आज हमें उन पुलिस अधिकारीयों को सार्वजनिक स्थानों पर प्रोत्शाहित एवं पुरस्कृति करने की जरूरत है जो ऐसे प्रभावशाली व्यक्तियों के खिलाफ शाहसिक कदम उठाते हैं | प्रभावशाली व्यक्तियों के खिलाफ उठाया गया कोई भी कदम आम जनता में एक मजबूत संदेश देगा की कानून-व्यवस्था सब पर एक समान लागू होती है और कोई भी कानून से ऊपर नहीं है | गरीबों के साथ भले ही थोड़ा उदार हो, लेकिन प्रभावशालियों के खिलाफ उदार न होने से उन्हें कानून-व्यवस्था तोड़ने से हतोत्साहित किया जा सकता है और इससे हमें उत्तर प्रदेश की बिगड़ती कानून व्यवस्था की स्थिति को सुधारने में निश्चित तौर पर मदद मिल सकती है |

 

हमें आज सरकारी तंत्र के हर स्तर पर सरकार के अधीन काम न करने वाली एक स्वतंत्र लोक-आयुक्त की जरूरत है जो सरकारी नौकरों ( मंत्री, चुने हुए प्रतिनिधि, नौकरशाहों इत्यादि) के कामकाज का निगरानी कर सके और उनकी भ्रष्ट करनी के लिए उन्हें जल्द से जल्द सजा दे सके | लोक-आयुक्त का कार्यालय गाँव, ब्लाक, तहसील, जिला एवं कमिशनरी के स्तर पर स्थापित कर सकते हैं और इसको यहीं तक सिमित न कर और स्तर पर भी बना सकते हैं | हर स्तर के लोक-आयुक्त में इमानदार न्यायाधीश, चयनीत प्रतिनिधि एवं आम जनता को शामिल कर इसे यह अधिकार दें की वह  उस स्तर के सरकारी नौकरों के खिलाफ शिकायत पर सुनवाई कर उन्हें तुरंत सजा दे सके | उदहारण के तौर पर जिला के स्तर का लोक-आयुक्त जिले स्तर के सरकारी नौकर जैसे जिलाधिकारी, पुलिस कप्तान इत्यादि के खिलाफ शिकायत की जांच करे और जांच के आधार पर यह उन्हें निलंबित या सेवा से बर्खास्त कर दे |  राज्य स्तर पर कुछ ऐसे आयोग जाँच के लिए बनाये गए हैं, लेकिन वे या तो प्रभावशाली व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई करने में असक्षम हैं या गरीब जनता की पहुँच से बहुत बाहर हैं |  हम उत्तर प्रदेश में कई अवसरों पर देख चुके हैं की रसूख वाले नौकरशाहों के द्वारा यहाँ तक की कोर्ट के आदेश का अवहेलना करने पर भी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती है|

लेखक, उत्तर प्रदेश में एक लड़के से मिला जो अपना पासपोर्ट बनवाने के लिए प्रार्थना-पत्र जमा किया था | कुछ पुलिस कर्मियों ने लड़के से संपर्क साधा था और उसका साफ-सुथरा पुलिस रिपोर्ट भजने के लिए रुपये दो हज़ार की मांग की थी, इसके वावजूद की लड़के का पुलिस रिकार्ड ख़राब नहीं था | लड़का घूस मे इतनी रकम नहीं देना चाहता था अतः इसलिए उसने पुलिस के पदानुक्रमित अधिकारयों को पत्र एवं इ-मेल के जरिये इसकी शिकायत की लेकिन उसकी शिकायत को किसी ने नहीं सुना और भ्रष्ट पुलिस कर्मियों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया गया | उसने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को भी फोन के माध्यम से कई बार संपर्क करने की कोशिश की लेकिन पुलिस महानिदेशक के कार्यालय के कर्मचारियों ने डीजीपी से बात नहीं करवाया और जब भी उसने पुलिस महानिदेशक के मोबाईल पर संपर्क साधने की कोशिश की तो मोबाईल हमेशा  ही बंद पाया | अतः इस तरह से उस बेचारे लड़के के पास घूस से बचने के लिए कोई चारा नहीं बचा और उसे पुलिस रिपोर्ट लगवाने के लिए मजबूरन रिश्वत देना पड़ा | यदि ब्लाक के स्तर पर सरकारी नियंत्रण से स्वंत्र एक लोक-आयुक्त का कार्यालय होता तो वह अपनी शिकायत व्यक्तिगत रूप से आयोग के समक्ष रख सकता था और जाँच के आधार पर दोषी पाए जाने पर आयोग भ्रष्टाचार में लिप्त पुलिस कर्मियों को सजा दे सकता था | इस सजा के बारे में सुनकर और दूसरे पुलिस कर्मी भी पासपोर्ट के लिए रिश्वत लेने से डरते या हिचकते और इस तरह से पासपोर्ट बनाने के लिए वर्षों से चली आ रही रिश्वतखोरी की प्रथा को विराम लग जाता और गरीबों को उनका हक़ पाने के लिए उनके मेहनत की कमाई को मुफ्त में ऐसे नहीं लूटा जाता| हर एक आदमी को अपने नौकरी, वेतन एवं पारिवारिक जिम्मेदारियों की चिंता रहती है और यदि उन्हें निलंबन, बर्खास्तगी आदि जैसे कार्रवाई एवं शीघ्र सजा पाने का डर हो जाय तो वह निश्चित तौर पर अपने आपको भ्रष्ट आचरण में लिप्त होने से  दूर रखेगा |

Law and order is most important aspect of services to public of UP. In ideal scenario, a state may have an atmosphere where valet of a person is left on the road and no one steals it, or even a girl can freely move in nigh without any fear. We may think this could be a dream right now for the public of UP, but there are lot of scope to improve the law and order conditions in UP to make it a better living place. There are many investors considering investing in UP but because of poor law and order and high in corruption, they are hesitating in doing so. We hear every day about murders, kidnappings, rapes, robberies, corruptions etc and people compare rule in UP with jugle-raj (animals kingdom), but who are made accountable for all this to avoid the repetitions.

We need to enforce the accountability of crime at different level in police department and if it’s not being controlled by police officers at that level, they may be recommended for a stringent action. If an official has fear of losing his/her job because of his/her corrupt practices or inability to act promptly, he/she won’t be influenced by unconstitutional pressure and will perform his/her duty honestly and dutifully. Murder of an innocent person is most heinous crime and it’s the duty of UP government to make it possible that not a single murder should take place in the state. This could be achieved by directly accounting the Superintendent of Police (SP) for a murder in the district. SP can be allocated with certain number of days to nab a murderer and put him behind the bar. If SP is not able to do so in given time period, he/she needs to be punished without fail. If there is increase in number of murder cases beyond certain limit during an SP’s tenure in a district, he/she must be shown the door and asked go home. This kind of punishment to police officials assigned for various levels of crime controls may certainly bring back the state of UP to path of normalcy and right developmental track.

Also, the judiciary system in our state is not as optimum and efficient as it should be in a democratic state. There are lawsuits and cases pending from many years. We need to improve the functioning of judiciary system to speed-up the process and deliver the final verdicts on the pending cases in timely manner. As we know that justice delayed is justice denied, the government must ensure this not to happen. This could be done by increasing the benches and judges in a court. Also, government can make laws based on the categories of cases and assign number of days in delivering the judgment. For example, in case of a murder, maximum of a year can be assigned to a judge to deliver the verdict, whatever the circumstances could be. Verdicts delivered earlier than the assigned time period could be used as the good performance of the judges and the investigation agencies, and could be a base for rewarding them. If a verdict is delivered beyond the specified time period, associated agencies and the judges would be accountable for the delay and could be imposed punishment.

Most of the rich, influential or powerful persons have speculation that the law & order is only for the general public but not for them. These people think that even if they do the major law violations, they could not be booked or caught because of their influence. This is happening because the system is having weaknesses. System must be empowered not to be lenient to these influential and even if the chief minister or his/her son is being involved in any kind of breaking law and order, he/she must not be forgiven. The police officials involved in such cases should be encouraged and recognized publicly for taking the bold steps. Action against influential will send strong signal to public that law and order is equal to every one and no one is above the law. Being lenient to poor but not to the influential may discourage influential from breaking the law and it would definitely help improving the deteriorating law and order conditions in UP.

There is need of inquiry commission at every level of state machinery to monitor the act of elected public representatives, ministers and bureaucrats. The levels may consist but not limited to Village, Block, Taluk, District, Headquarter of Districts and State. The commission may be formed with honest judges, public representatives and government officials. The commission at a particular level will have authority to hear the plea and complaints only about lok-sevaks at that level and empowered with suspension and dismissal of an officer at that level. For example, the commission at district level may work on complaints at district level officers, say DM and/or SP, and based on the findings in inquiry, it may suspend or even dismiss the DM or SP. There are many such commissions at state level, but they are either ineffective in taking action against powerful bureaucrats/ministers or out of reach of the poor public. Even we have seen at several occasions that court orders are being violated by top level bureaucrats in UP.

Author came across a person in UP, who had filed an application for his passport. Few police men contacted that person for the inquiry purposes and asked him to pay rupees two thousands to prepare a clean police report, though his police records were clean and perfect. He didn’t pay the bribe and complained about the act of police officials via letters and e-mails to authority in hierarchy, but no one heard him and there was no action taken against the corrupt police officers. He tried several times to contact to Director General of Police (DGP) of UP by phone, but the DGP’s staff never allowed him to talk to DGP and he found DGP’s cell phone always switched-off. Therefore, that person was forced to pay the bribe to clear the police report. If commission would have been set-up at block level, he would have told his story presenting himself personally to the commission and commission would have punished the involved officials. After hearing about the punishments, other officials would have not dared to continue the process. Everyone thinks about the salary and if he/she has fear about lay-offs, he/she will certainly restrain himself/herself from engaging in corrupt practices.

Here are some examples of Law & Order in UP:

Murders continued…

One Response to “कानून और व्यवस्था – On “Law and Order” – by Dr. Vinaya K. Singh, Ph.D.”

  1. S. N. Singh Welfare & Education Society and its Mission « How to transform Uttar Pradesh (UP) into Uttam Pradesh (Best State) Says:

    […] On “Law and Order” – by Dr. Vinaya K. Singh […]

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