विकाश के लिए नीति – On “Development” – by Dr. Vinaya K. Singh, Ph.D.

हम उत्तर प्रदेश के संपूर्ण विकाश के लिए सिर्फ सरकार के द्वारा किये जा रहे विकाश कार्य के ऊपर निर्भर नहीं रह सकते और हमें निजी संस्थाओं से विकाश के लिए मदद  लेनी  चाहिए |  लेकिन यदि निजी संस्था किसी विकाश कार्य के लिए सोचती है तो उसे पैसे की जरूरत पड़ेगी और वह इसे सिर्फ आम जनता या किसी और  संस्था के द्वारा दिए गए दान से  कराने में सक्षम नहीं हो सकती | इसके अलावा, यदि निजी संस्था  आम जनता से विकाश के लिए दान माँगने की कोशिश भी करती  है तो अधिकाँश जनता हमारे तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की वजह से दान देना नहीं चाहेगी, चाहे वह निजी  संस्था   कितनी  भी इमानदार  क्यों न हो | इसमे कुछ नीच  मानसिकता  वाले  लोगों को दाल में काला भी नजर  आने लगता है और वह सोचते हैं की संस्था जरूर लूट-खसोट करेगी, भले ही आप कितने भी सच्चे दिल से किसी विकाश कार्य को अपने हाथों में क्यों न लें  |     अतः  निजी संस्था को पहले किसी व्यवसाय के माध्यम से पैसे अर्जित  करने  की जरूरत पड़ेगी जिसे   वह इमानदारी व बिना किसी भ्रष्ट कार्य में लिप्त हुये कर सकती है| उदहारण के तौर पर उच्च कोटि की शिक्षा देने के लिए निजी संस्था इसे एक व्यसाय के तौर पर खोल सकते हैं लेकिन यह ध्यान रखा जाना चाहिए की भ्रष्टाचार मुक्त रहते एवं सरकार की नीतियों का पालन करते हुये पारदर्शिता बरक़रार रखी जाय | कोई भी सरकार  सभी बेरोजगार लोगों को काम नहीं दे सकती  अतः निजी संस्थाओं से ज्यादा से ज्यादा बेरोजगारों को काम देने के लिए सहूलियत देने के साथ बेरोजगारों को निजी व्यवसाय खोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए |  यह  हम सस्ती दरों पर  ऋण की व्यवस्था करके या लोगों को सस्ती लागत या मुफ्त का पेशेवर प्रशिक्षण देकर कर सकते  हैं |  और इन सबके लिए हम चाहते हैं की ऐसी निजी संस्थाएं आगे आयें जो किसी व्यवसाय के माध्यम  से पैसे अर्जित  करें और अपने कमाए हुये धन का कुछ हिस्सा देश के लिए लगायें | वे कोई लाभ न कोई हानी के तर्ज पर कार्य करें एवं बेरोज़गारी दूर करने के साथ देश का विकाश भी करें | सरकार को सिर्फ जनता  का सेवा कार्य एवं विकाश के लिए बुनियादी सुविधाओं को मुहैय्या कराने पर ध्यान देने के लिए छोड़ देना चाहिए | कोई लाभ न कोई हानि नीति के अंतर्गत एक निजी संस्था किसी  व्यवसाय के माध्यम से लाभ के तौर पर पैसे  कमा सकती  है, लेकिन उसे कमाए हुये सारे धन को समाज कल्याण पर हानि के रूप में खर्च  करना  पड़ेगा |

आज हमें ऐसे स्कूलों की जरूरत है जो कम खर्च में व्यवसाय एवं नैतिकता पर आधारित उच्च कोटि की शिक्षा प्रदान और ग्लोबल ग्राम की भाषा अंग्रेजी तथा व्यवसायिक पेशे में भी दक्ष कर सकें, ताकि उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि  प्रदेश   के  बाहर   किन्हीं   अन्य   राज्यों या विदेशों में भी अपने लोग जाकर सम्पन्नता हासिल कर सकें |  आज हमें आवश्यकता इस बात पर जोर देने की है की उत्तर प्रदेश के प्रत्येक नागरिक को बचपन से ही अच्छी शिक्षा मिले और यदि उन्हें कहीं नौकरी न भी मिल पाये तो वे अपना व्यापार शुरू कर सकें |  शिक्षण संस्थाओं में इतनी सीटें जरूर होनी चाहिए की जो भी बच्चा या बच्ची  जिस विषय में पढाई करना चाहे उसे  उस  विषय में  सीट किसी न किसी विद्यालय  में अवश्य  मिल जाय | हमें यह कोशिश करनी चाहिए की पढाई के क्षेत्र में महिलायें पीछे  न रहें क्योंकि  हमारे समाज के बनाये हुए रीति-रिवाजों एवं बंधनों की वजह से उतर  प्रदेश की ज्यादातर महिलायें अभाव ग्रसित हैं |  हमने उत्तर प्रदेश में देखा है की छात्रवृति  बांटना  सरकार के लिए एक प्रचलन सा हो गया है लेकिन इसका कुछ भी असर सतह पर दिखाई नहीं देता | सरकार को चाहिए की उन अभाव -ग्रस्त  लोगों  को  ढूंढकर  यह छात्रवृति दी जाय जिनकी पढाई इसके बिना रूक सकती है |   उत्तर प्रदेश का विकाश तभी संभव है जब इसका हर नागरिक शिक्षित होकर प्रजा-तन्त्र के असूलों एवं अपने अधिकार को समझ सके तथा हर किसी को काम मिले या काम न मिलने  की स्थिति में कोई व्यवसाय शुरू करने में सक्षम हो सके |  किसी को भी रोटी, कपड़ा और मकान के लिए ज्यादा संघर्ष न करना पड़े और उन लोगों  पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है जो दशकों से अभाव में जीते चले आ रहे हैं |  एक जरूरत मंद का निर्धारण करने के लिए वंचित  प्रमाण पत्र का इस्तेमाल एक उपकरण के रूप में किया जा सकता है |

उपरोक्त   चीजों के लिए बहुत अधिक मात्रा में धन की आवश्यकता पड़ेगी और इसलिए लेखक ने सरकार के अलावा निजी संस्थाओं को  कोई लाभ न कोई हानि के तर्ज पर आगे  आकर काम करने का सुझाव दिया है, ताकि वे किसी व्यवसाय के माध्यम से धन कमा कर सरकार के साथ कन्धा से कन्धा मिलाकर प्रदेश के उत्थान में हाथ बटाएं |  लघु इकाईयों की मदद से कुछ बेरोज़गारों  को रोज़गार देकर हम उतनी मदद नहीं कर सकते और उपरोक्त   परियोजनाओं  के संचालन के लिए हमें बहुत अधिक धन की जरूरत पड़ेगी |  शुरू-शुरू में निजी संस्था लघु इकाई लगाने के बारे में सोच सकती है लेकिन उसे बाद में अवसर के अनुसार और दूसरे व्यसाय बढ़ाकर अधिक धन कमाने की व्यवस्था  कर सकती है जिससे की समाज के ज्यादा से ज्यादा लोगों की मदद की जा सके |  लेखक का सरकार को यही सुझाव है की वह उत्तर प्रदेश में ऐसा माहौल बनाये की ज्यादा से ज्यादा निजी निवेशक  उत्तर प्रदेश में निवेश के लिए  आयें और कोई लाभ न कोई हानि के तर्ज पर काम करें ताकि प्रदेश का और भला हो सके  |

इस किताब का लेखक अमेरिका  में काम करता है और बहुत सारे लोगों के समपर्क में है जो उत्तर प्रदेश में निवेश करना  चाहते हैं | अतः इसी उपलक्ष्य  में लेखक ने उच्च कोटि की एक एक निजी प्राइवेट  इंजीनियरिंग   कालेज  खोलने  या लघु इकाई, जैसे चीनी मिल या पेपर मिल, लगाने  के बारे में सोचा और इसके ऊपर  उत्तर प्रदेश के नियम-कानूनों का अध्ययन  किया |  लेखक को प्राइवेट  इंजीनियरिंग   कालेज  खोलना थोडा आसान लगा, अतः वह बलिया जिले के एक गाँव में इसे खोलने  का प्रस्ताव इस योजना के साथ लेकर उत्तर प्रदेश आया की इसके माध्यम से जरूरत मंदों की मदद करनी है और इसे कोई लाभ न कोई हानि के तर्ज पर चलानी है |  नियम के अनुसार इस परियोजना के लिए २५ एकड़ जमीन और १.५ करोड़ रुपये चाहिए थे |  लेखक की सामाजिक संस्था सच्चिदा नन्द सिंह वेलफेयर एंड एडुकेशनल सोसाईटी की तरफ से जमीन की व्यवस्था कर दी गयी थी और निवेशकों  के माध्यम  से १.५ करोड़ रुपये भी उपलब्ध हो गए थे |  जब  लेखक ने यह परियोजना लगाने के लिए अधिकारियों को संपर्क किया तो उत्तर प्रदेश में ब्याप्त भ्रष्टाचार इसमे रोड़े लगाने लगी | सरकारी नौकरों के घूस की मांग की वजह से इस परियोजना पर लगने वाली लागत का बजट दूना होने लगा तो निवेशक भाग  खड़े हुए और इस तरह से यह परियोजना ठप हो गयी | ऐसे ही अन्य दूसरी परियोजनाओं के लिए भी निवेशक तैयार हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार में आकंठ डुबे हुए लोक-सेवकों की  वजह से कोई रूचि नहीं ले रहा है और आम जनता की स्थिति दिन प्रति दिन दयनीय होती जा रही है| 

 

Author’s understanding is that it is very important to be part or member of working committee or any committee of a political party or any constitutional assembly to have a say. You can’t influence a party or government agenda from outside as much as you could from inside. Most of the time political parties/government agencies don’t care about our views. Author is working with many parties and lok-sevaks without being a member of it for the welfare of society and has presented with implement-able ideas to at least start with few but author has been minimally successful. Most of them say ideas are good and if implemented, we can get governance to expectations of public. But guess what? Most of them aren’t taking seriously. But for example, if one would have been in the part of a political party or government, at least he/she would have tried to convince to put together something in party/government priorities. Until you don’t have a say in party or government, you are not sure if you could influence, and this could be a gamble from outside.

These are author’s views purely based on his experiences but he whole heartedly appreciates everyone’s contributions and enthusiasm who works for welfare of mankind and he doesn’t have doubt about his/her honest intensions. Once you are in politics, you can’t be an ideal. But at least author expects from politicians to practice values and morals (honesty, integrity, politeness/humbleness, quality services to public, respectability and accountability towards public, non-criminalization etc) based politics, which are lacking nowadays in most of them. After all, author feels he might have capacity to influence the parties and their policies by not binding to a single party, but definitely he needs some friends everywhere to have them implemented.

To fund any developmental work, definitely we need money and we can’t depend fully upon begging or on donations from public or organizations. Also, if you ask for donations, most of the public have some mean idea even if you have noble cause because of act of people involved in corruption. They think we can use the money for our own welfare. So, we need to start some businesses where we can earn money honestly and though without any corruption. So, even if you start private colleges or industries, we have to initially take them as money earning businesses but by maintaining the transparency and sticking to the policies as much as possible.

It is not possible to provide the employments to all the unemployed and we need to think about encouraging them to start their own businesses. We can do it by giving affordable or free of cost professional or any other training to them and provide surety-less fund in form of loan to help them start their own business. We can’t depend on government to provide all these, otherwise it may not be able to develop the infrastructure for progress and also banks may go bankrupt. So, the idea is to let private organizations jump into this and have a “no profit, no loss policy” to run it. Thus an organization may earn money from a business and loss in social welfare and so could be able to maintain the “no profit, no loss” policy.

We need number of schools where we can provide affordable profession based moral education with English compulsory as it is the language of Global Villages and could enable a professional to work outside a state or even a country, if need be. Also, we want to make each and every child (male or female) get educated and start his/her own businesses in future, if he/she couldn’t get any job. Not a single child should left behind because of unavailability of seat in school. Most importantly, priority should be given to girls/women as they are more non-privileged than boys/men. We may want to fund for education, in case, if anyone feels if he/she can’t continue because of economic hardship. Aim should be to make everyone to qualify enough to understand their rights and true democracy, get a job or start a business. No one should left behind struggling for Roti and Dal (bread and butter) and importance should be given to uplifting of underprivileged first. The deprivation certificate (please see section 1.7) can be used as a tool to determine the needy.

But all these need solid fund and for that reason author is advocating private organizations to start with some business oriented units. Setting up of small scale unit solely for employing unemployed people will do not help much if we don’t think to arrange money to fund projects at large as mentioned above. Initially an organization could start with small scale unit and later think for other opportunities to enable it to influence the chunk of the society. Author encourages private organizations to invest in UP and work on line that author has suggested above.

In this process, author came across the rules for setting up of private colleges or starting up of small scale sugar factories and paper mills in UP. But all these need investors. He came up with proposal to start a private engineering college in a village of Ballia, UP with some rules and regulations set up to basically help the needy based on “no profit, no loss” basis and reached to many investors. This project needs about 1.5 crores of rupees and 25 acres of land. The S. N. Singh Welfare and Education Society, the organization for which the author works, has been able to arrange the land but no investors. The basic hurdle for investors is corruption and government officials’ corrupt demands making the investment double. There is demand for Rupees1.5 crores as Suvidha Sulka (bribe) and many levels of officials and parties are involved in it. Thus it didn’t materialize yet. Other industries also need investment of similar scale. Author is still pursuing it and he is sure, he could be successful one day.

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