जनता के लिए प्रदत्त सरकारी सेवाएं – On “Services” – by Dr. Vinaya K. Singh, Ph.D.

 

एक लोक-सेवक (राज्यपाल, मुख्य-मंत्री, मंत्री, सचिव, डी. जी. पी., डी. एम., एस. पी. इत्यादि )   की प्रथम एवं अद्वितीय कर्तव्य है की वह अपने ग्राहकों (आम जनता ) की गुणवत्ता-पूर्ण सेवा करे | प्रबंधन के गुरु पीटर ड्रकर लोगों को कभी यह उपदेश दिया करते थे की ग्राहक ही राजा है और उन्हें आदर देकर उनकी शिकायतों या कार्यों का निपटारा दायित्व-पूर्वक, ठीक से एवं एक तय समय-सीमा के अंतर्गत किया जाय | यदि किसी व्यक्ति के कार्य में एक तय समय-सीमा  से ज्यादा समय लगता है  तो लोक-सेवक का यह दायित्व बनता है की वह समय-समय पर कार्य की वस्तु-स्थिति से ग्राहक को अवगत कराये ताकि ग्राहक को उसके कार्यालय का चक्कर  पर चक्कर न लगाना  पड़े और बिना मतलब का उसे पैसे और समय न बर्बाद करना पड़े | उसके अभिलेखों का सुरक्षा के साथ रख-रखाव किया जाय ताकि उसे आसानी से ग्राहक को उपलब्ध कर  वस्तु-स्थिति से अवगत कराया जा सके |  लेखक को एक घटना याद है | उत्तर प्रदेश की एक ग्रामीण महिला ने अपने क्षेत्र के जिले पर जाकर अपंग पात्रता के लिए सरकार द्वारा दिए गये लाभ को पाने के लिए आवेदन दिया | उसके बाद उसने ६-महीने तक उत्तर या संवाद के लिए इन्तजार किया लेकिन उसे सरकारी कार्यालय से कोई सूचना नहीं मिला | ६- महीने बाद वो एक बार फिर जिले में स्थित कार्यालय पहुँची और वहां पर नियुक्ति लिपिक से आपने आवेदन के बारे में पूछी | लिपिक बोला की उसका यहाँ कोई आवेदन प्राप्त नहीं हुआ है और फिर से एक नया आवेदन करे | उस गरीब महिला के पास दुबारा आवेदन करने के सिवा और कोई दूसरा चारा नहीं था अतः उसने दुबारा आवेदन  दिया |  यह कहानी ऐसी ही चलती रही | वो  हर ६-महीने पर जिले का चक्कर काटती रही और तिबारा, चौबारा…आवेदन करती रही लेकिन कुछ नहीं हुआ और इस तरह वर्षो बीत गये | कुछ बिचौलिए मिले और घूस देकर काम करने का  पेशकश किये लेकिन उस गरीब के पास देने को कुछ भी नहीं था | कार्यालय के एक अधिकारी एवं क्लर्क ने आधे साल का लाभ लेकर कुछ मदद करने की पेशकश की लेकिन वह महिला तैयार नहीं हुयी |  

 

वह अभी भी इस आश में है की एक न एक दिन कोई भलमानस उसे मिलेगा और उसको उसका हक़ दिलाने में उसकी मदद करेगा | यदि वह भ्रष्ट अधिकारियों को घूस दे दी होती तो उसे उसके हक़ का कुछ भाग मिल गया होता लेकिन उसने घूस देने से इनकार किया और उसकी सजा वह अभी तक भुगत रही है | वह मदद के लिए हर जगह गुहार लगाई है लेकिन कोई उच्च अधिकारी उसकी बातों पर ध्यान नहीं देता है क्योंकि घूस का माल खाने में वे सभी शामिल हैं | यदि हम एक ऐसा तंत्र उत्तर प्रदेश में विकशित करते हैं की प्रत्येक शिकायतों का निस्तारण एक समय-सीमा  के अंतर्गत एवं निर्धारित पद्धति के मुताबिक़ हो तो हम एक कुशल एवं गुणवत्ता-पूर्ण सेवा उत्तर प्रदेश के नागरिकों को दे सकते हैं | यदि कोई लोक-सेवक ऐसा नहीं कर पाता तो उचित दंड का प्रावधान हो और समय रहते दण्डित कर लोक-सेवकों में डर पैदा किया जाय ताकि वो अपने आप ही इस कार्य-संस्कृति  का पालन करने के लिए मजबूर हों, अन्यथा उसकी सेवा समाप्त कर दी जाय | काम में देरी होने पर दंड के तौर पर प्रति दिन के हिसाब से जुर्माना, वेतन-वृद्धि  पर रोक, पदोन्नति में कटौती, निलंबन या नौकरी से छुट्ठी हो सकती है | दंड का निर्णय सरकारी नौकर की अकर्मण्यता और उससे आवेदक पर होने वाले असर  को ध्यान में रखकर लिया जा सकता है |  इस बात का भी प्रावधान होना चाहिए की यदि जनता किसी लोक-सेवक के खिलाफ उसके गलत करतूतों के लिए शिकायत करती है तो उसके खिलाफ जांच कर तथ्य सही पाए जाने पर जरूर से जरूर कार्यवाही हो तथा इसके साथ ही जाँच के प्रगति के बारे में भी शिकायतकर्ता को समय समय पर सूचना दी जाय |   

 

लेखक ने उत्तर प्रदेश सरकार के कार्य-प्रणाली का विश्लेषण करने के बाद पाया की  सरकारी खर्च में कटौती के बहुत सारे अवसर हैं लेकिंग उस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है | लोक-सेवकों जैसे राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्री गण, जिला अधिकारी, पुलिस  कप्तान इत्यादि पर बहुत साड़ी सुविधाओं एवं भत्ता के रूप में जनता के पैसे का फिजूल खर्च किया जाता है, जिसकी कोई आवश्यकता नहीं है | उनसे क्यों नहीं दूसरे सरकारी कर्मचारियों की तरह व्यवहार किया जाता और उन्हें वैसी ही सहूलियत नहीं दी जाती ? क्या उन्हें उनके काम के मुताबिक़ तनख्वाह नहीं दी जाती ? उत्तर प्रदेश सरकार को फिजूल खर्ची की दिशा में सोचना चाहिए |  सरकार को सिर्फ काम के अनुसार तनख्वाह देना चाहिए और यह सरकार में सेवा करने वाले सभी लोगों पर लगना चाहिए और फालतू की दूसरी सेवाएं और सुख-सुविधाएँ हटा लेनी चाहिए |  उदाहरण के तौर पर, जिला अधिकारी को ही ले लीजिये | हम देखते हैं की उसे बहुत सारी सुविधाएँ जैसे महल, बहुत सारे अंगरक्षक, चालक, सरकारी गाड़ियाँ,  बहुत सारे व्यक्तिगत सहायक,  जनसंपर्क अधिकारी, लिपिक, माली, बहुत सारे चपरासी, रसोईया एवं अन्य सुविधाएँ मिली हुयी है | यह एक लोक-सेवक के विलासिता के लिए दिया  हुआ खर्च है जो की ब्रिटिश राज से छानकर चला आ रहा है | क्या जनता के पैसे को इस तरह से लोक-सेवकों के विलासिता के लिए लुटाना उचित है ? लेखक के अनुसार इस तरह का सरकारी खजाने से खर्च अनुचित है |  सरकार इन्हें तनख्वाह के साथ घर और कार के लिए  भत्ता दे सकती है | उसको दिया गया कार्यालय, उसके सरकारी कार्य एवं लोक-सेवा संपन्न करने के लिए पर्याप्त है | 

 

जिला अधिकारी एवं ऐसे ही अन्य लोक-सेवकों को दिए गए महलों का प्रयोग इंदिरा आवास-विकाश या गरीबों के लिए चलाये गए अन्य उपक्रमों के लिए हो सकता है | दूसरे पूर्ण विकशित एवं धनि देशों में ऐसा ही होता है तो भारत में हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते? कब तक ब्रिटिश राज से आ रही परंपरा को हम ढोते रहेंगे |  विकशित देशों में लोक-सेवक अपनी  गाड़ी खुद चलाते हैं या घर का व्यक्तिगत कार्य करने के लिए अपने खर्च पर नौकर रखते हैं | यदि हम ऊपर बताये हुए सुझावों के मुताबिक़ कटौती करते हैं तो सरकारी खजाने में बहुत बचत होगा और लोक-सेवकों में एक अहम-रहित संस्कृति का विकाश होगा और सभी  सरकारी कर्मचारी ( राज्यपाल से लेकर लेखपाल तक ) एक समान हो जायेगें साथ इसके साथ ही उनमे एक दूसरे के प्रति ऊँच-नीच के भेदभाव की गुंजाईश भी मिट जाएगी |  इसके अतिरिक्ति, सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए की कोई भी सरकारी कर्मचारी ( राज्यपाल से लेकर लेखपाल तक ) सरकारी खजाने का प्रयोग अपनी व्यक्तिगत भले के लिए न करे | उदहारण के तौर पर यदि उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री किसी अपने रिश्तेदार या दोस्त के वैवाहिक समारोह में जाता है तो उसे ऐसे समारोह में अपने खर्चे  पर भाग लेना चाहिए न की जनता के खजाने के पैसे पर | साथ ही ऐसे अवसर पर अधिकारीयों  या जनता के द्वारा उसे   आम आदमी की तरह तरजीह देनी चाहिए न की पूरे प्रदेश की सरकारी विभाग को उसकी सेवा में लगा देना चाहिए | यदि ऐसा करने के लिए कोई प्रोटोकॉल है तो उसे हटा देना चाहिए | 

 

इसके अलावा, उत्तर प्रदेश में लोक-सेवकों द्वारा लोगों की सेवा उनके रुतबे के अनुसार की जाती  है और लोक-सेवकों या जनता से वही इज्जत पाता है जिसके पास या तो पैसा है या गाड़ी पर रंग-बिरंगी बत्ती लगी  है |  जब कोई राजनितिक पार्टी सरकार बनाती है तो ऐसी बत्तियों को रेवड़ी की तरह बाँटती है ताकि सरकार जीवित रहे और और सरकार बनाने वाले ब्रिटिश राज के हुक्मरानों की तरह विलासिता  का जीवन यापन करते रहें | लोक-सेवकों का मुख्य कर्तव्य होता है जनता की सेवा | क्या ये बत्तियां जनता का नौकर बनकर अच्छा सेवा प्रदान करने में किसी तरह सहायक हैं ?  लेखक के शोध की मुत्ताबिक जनता की सेवा के लिए इन बत्तियों की कोई जरूरत नहीं है | आम जनता के हित में उत्तर प्रदेश सरकार को इन तरह की बत्तियों का प्रचलन बंद कर देना चाहिए |  यह आम नागरिक में रुतबा के अनुसार भेदभाव को मिटाएगा और लोगों को  बराबरी का अधिकार भी देगा |  गाड़ियों पर इन बत्तियों का प्रचलन आपात  स्थितियों  में जनता तक शीघ्र  सेवा पहुंचाने के लिए किया गया था लकिन उत्तर प्रदेश में इसका प्रचलन रुतबा और शेखी बखारने  के लिए हो गया है |  अधिकतर विकशित देशों में इस तरह की बत्तियां उन विभाग की गाड़ियों पर मिलती हैं जो आपात सेवा के लिए बनाई गयी हैं | उदहारण के तौर पर अग्नि-शामक, पुलिस  एवं स्वाथ्य सेवा विभाग इसके लिए अधिकृत होते हैं |  यदि उत्तर प्रदेश सरकार, आम जनता के बारे में सोचती है तो उसे इस दिशा में ऐसा ही कदम उठाना चाहिए | 

 

किसी भी त्रुटी-विहीन प्रजा तंत्र के लिए एक राज्य में शिक्षित जनता का होना बहुत महत्वपूर्ण है | सरकार को यह कोशिश करनी चाहिए की राज्य १००% साक्षरता दर को प्राप्त कर ले | शिक्षित जनता ही प्रजा-तंत्र में अपने हक़ को समझ सकती है और उसके लिए लड़ सकती है | जनता को यह समझना होगा की प्रजा-तंत्र में क़ानून का पालन करने वाली आम-जनता, जो की सरकार चलाने  में शामिल नहीं  है और सरकारी खजाने से किसी तरह का पैसा नहीं लेती, वही लोक-सेवकों की मालिक है, न की लोक-सेवक उनकी | लोक-सेवक उनकी सेवा के लिए हैं और इसके लिए उन्हें जनता के खजाने से मेहनताना दिया जाता है |  लेखक को मिले एक घटना के विवरण की मुताबिक़ एक ग्रामीण ने अपने क्षेत्र के संसद सदस्य से यह अनुरोध किया के वो चलकर उसके गाँव के ग्रामीणों की दुर्दशा को देखे और सड़क, पानी तथा जल-निकासी  की व्यवस्था कराये ताकि ग्रामीणों की जीवन-शैली में कुछ सुधार हो सके |  आपको मालूम है की संसद सदस्य का उत्तर क्या था | उसका उत्तर था की वह गाँव के लोगों का नौकर नहीं है और वह घर-घर जाकर लोगों के जल-निकासी तंत्र का मरम्मत करने के लिए नहीं है | उसे पूरे देश के समाज का कल्याण देखना है |  यदि एक संसद सदस्य या विधायक की ऐसे पद पर पहुंचकर सोच ऐसी हो जाय और वह अपने को महत्वपूर्ण व्यक्ति समझने लगे तो आम जनता को ऐसे व्यक्ति को दुबारा चुनकर ऐसे पद तक नहीं पहुँचने देना चाहिए|  लेकिन दुःख की बात है की उत्तर प्रदेश में धन-बल के वजह से ऐसा नहीं होता | उत्तर प्रदेश को वास्तव में इमानदार एवं कर्मठ लोक-सेवकों की जरूरत है न की ब्रिटिश राज की तरह राज करने वालों या महत्वपूर्ण व्यक्तियों की |  यदि जन-प्रतिनिधि को यह समझ में आ जाय की प्रजा-तंत्र में सरकार चलाने वाला  जनता का एक नौकर होता है और आम जनता से उसकी हैसियत को कम करने का प्रावधान कर दिया जाय तो  इस क्षेत्र में ईमानदार लोग जायेगें और साम-दाम-दंड  से सरकार न बनाकर विपक्ष में बैठना ज्यादा पसंद करेंगे |  मूलरूप से इस बदलाव का परिणाम यह होगा की सरकार चलाने वाले लोक- सेवकों का मालिक आम जनता या विपक्ष होगा न की इसका उल्टा होगा और इससे आम जनता का बहुत बड़ा भला होगा | 

एक बार लेखक के जिला बलिया का रहने वाला एक व्यक्ति लेखक से मिला और अपने साथ  घटित एक घटना बताया | उस व्यक्ति का जिलाधिकारी, बलिया से एक काम था  लेकिन  वह जिला-अधिकारी के रवैये से खुश नहीं था | जिलाधिकारी उस व्यक्ति के शिकायत को हल करने में हील-हवाली कर रहा था |  जब उस व्यक्ति ने उसके शिकायत पर किये गए जिला-अधिकारी के गलतियों को उजागर किया तो जिला-अधिकारी उस पर गरम हो गया और उसके साथ अमानवीय व्यवहार भी किया |  जिला अधिकारी ने उसके काम में गलतियाँ निकालने वाली बात एवं उस व्यक्ति द्वारा उससे उलझने को दिल से लगा लिया और चूँकि वह अपने आपको बलिया का मालिक समझ बैठा था अतः इससे उसके अहम को ठेस लगा और उस व्यक्ति के शिकायत को हल करने में मदद नहीं किया | ऐसा एक प्रजा-तांत्रिक राज्य में नहीं होना चाहिए लेकिन उतर प्रदेश का आलम यह है की ऐसे अधिकारी ऊपर से नीचे तक भरे हुए हैं जो अपने आप को जनता का नौकर नहीं  समझते   और उनसे तर्क करने पर काम को लटका देते  हैं | प्रजा-तन्त्र में राज्य के एक नागरिक को पूरा अधिकार है की वह लोक-सेवकों से तर्क कर उनकी गलतियों को सुधारने का सलाह दे |   प्रजा-तंत्र में हर एक नागरिक, जिला अधिकारी के जवाबदेही को जांच सकता है और जिला अधिकारी  को यह नहीं समझना  चहिये की केवल संसद सदस्य, विधायक या मंत्री ही उसका मालिक है, बल्कि वास्तविकता में आम आदमी ही उसका मालिक होना चाहिए | उस व्यक्ति के साथ अमानवीय व्यवहार करने के बजाय  जिला अधिकारी को चाहिए था की अपनी गलतियों को सुधारकर ऊससे माफी मांगे, अन्यथा ऐसे अधिकारी की छुट्टी होनी चाहिए | लेखक का जिलावासी बहुत अच्छी तरीके से लेखक को यह समझाया की यदि प्रजा-तांत्रिक व्यवस्था  के नियमों का सही तरह से पालन किया जाय तो वह जिला अधिकारी, मुख्यमंत्री या राज्यपाल का एक शासक है और इनको निर्देश एवं नियंत्रण कर सकने का अधिकार है | जब लेखक ने पूछा की कैसे, तो उसने बताया की प्रोटोकोल या बॉस होने के वजह से एक जिला अधिकारी मंत्री, मुख्यमंत्री या जन प्रतिनिधियों के आगे झुकता है | जन प्रतिनिधि ही राज्यपाल  की नियुक्ति में योगदान देता है, लेकिन ये सभी लोग जो की जिला अधिकारी के नियंत्रक हैं, वो वोट के समय एक आम जनता के सामने झुकते हैं| इसके अलावा,  जिलाधिकारी को आम जनता की टैक्स के पैसे से ही तनख्वाह एवं सारी सुविधाएँ  दी जाती है अतः परोक्ष रूप से वह जिला-अधिकारी का एक मालिक हुआ |  लेखक अपने जिलावासी के द्वारा दिए गए तर्क को सुनकर चकित रह गया |  लेकिन यह लाख टके की बात है की क्या यह उत्तर प्रदेश में काम करता है या कभी ऐसा ये लोग ( राजनीतिज्ञ एवं लोक-सेवक ) होने देंगे | यदि ऐसा होने लगा तो उत्तर प्रदेश में एक आदर्श लोक-तंत्र स्थापित होगा और यही लेखक की कामना है |  हमने कई बार जन-सभाओं में अपने नेताओं द्वारा यह कहते हुए सुना है की राज्य की जनता उनके लिये भगवान् की तरह है और वो सरकार बनाये तो उनकी पूरी सेवा करेंगे | लेकिन यह सब आम जनता को खुश करने की एक नौटंकी या चाल होती है |  वास्तविक जीवन में वो कभी ऐसा नहीं सोचते |

The first and foremost duty of a lok-sevak must be to provide quality services to his/her customers. It should be ensured that public get due respect and their complaints or requests are addressed properly and sorted out in specified time period responsibly. If a person’s request takes longer than specified time to resolve, he/she should be communicated time to time in a proper manner so that he/she couldn’t run around the officials and waste money and time. His/her records must be maintained and should be easily available, if he/she needs status on his/her request. Author remembers an instance here. One villager of UP had applied for handicapped benefit to respective office of her district head quarter. She didn’t receive any correspondence on her application in six months. She again visited to the office and asked about the status of her application. The office clerk said there was no such application, write and submit new one. That poor villager didn’t have any option but to file again. This story ran many years and still she is in the hope that she might get her benefit due one day or some day an angel will come to her help and solve her problem. If she would have paid money to corrupt officials, her case could have been resolved, but she didn’t do so.  If we evolve a system where each and every complaint is taken care of in a pre-defined manner, we may be able to provide efficient quality service to public. If even an individual complaints against an officer for his/her wrongful deeds, the system should investigate against the officer and take action without fail and should communicate to individual about the action.  

 

Author also analyzed that there are lot of opportunities where we can make reduce the government costs. Bureaucrats, ministers and elected representatives are given with lot of perks and facilities. Are these really required? Why they aren’t equal to other employees. Don’t they get salary for their work? The UP government should think in this direction. It should just provide the salary and remuneration as per their work and cut the all other facilities. For example, we see that a District Magistrate (DM) is provided with body guards, big bungalow, drivers, cars, secretaries, public relation officers, clerks, peons, cooks, gardeners etc apart from many other facilities. This is really a luxurious life that seems as has filtered from British rule. Is there any need to provide all these facilities? Author thinks no. Government should just provide the allowances for car, house and other as part of salary. Office set-up with a helper is sufficient for him/her to work. DM’s bungalow may be used for developing the Indira Awas-Vikas (Home for poor) or any other plan. It does work in other developed country, then why not in India. People drive their car themselves and hire domestic help on their own expenses. If this could be applied from top to bottom in each and every government institution, there could be a great saving for government and may make realize a lok-sevak to serve without developing egoistic culture. Also, government must ensure that government employee at any level of hierarchy should never use government expenses for his/her personal affair. For example, if chief minister attends a marriage party of his/her friend or relative, he/she should make sure that he/she does it on his/her own expenses. Also, at that time he/she should be given treatment as a general public and not a single government official should go to receive him anywhere.  

The statuses in UP is also measured by the Lal Batti, Neeli Batti, Peeli Batti (colorful lights on vehicles) etc. and government distributes it like ravadis (special sweet in UP) to survive. The main goal of Lok-Sevaks is to serve the public. Are these Battis (lights) really needed by Lok-Sevaks to serve better the public of UP? The author surveyed the people of UP on this and 99% said, no. In the best interest of public of UP, the government must make law to abolish the use of these lights and make every Elected Representatives, Lok-Sevaks and Ministers use vehicles without lights. This could avoid discriminations and also bring equality among the citizens. The basic idea behind the lights was to provide prompt services to public in cases of emergencies, but our systems in UP has become so corrupt that these lights have now become the status symbols. Most of the developed countries use these lights only on emergency service vehicles to provide emergency services to their citizens and only fire, police and health departments are authorized to use them. The government of UP should also think on this line, if it really wants to care the common people.

 

Educated public is very much important for healthy democracy. The government should aim for 100% literacy. Public should be educated to know their rights and must be communicated that the lok-sevaks are not their bosses but servers. In one of instances reported to the author, a villager requested to his Member of Parliament (MP) of his constituency to visit and see the apathetic conditions of the villagers and help to provide road, water, drainage etc to improve the living standards of the villagers. Do you know what the response of the MP was? His response was that he was not the villager’s servant and he was not there to repair drainage system of the villager’s house. He was there to look for the welfare of the country. If an MP or Member of Legislative Assembly (MLA) has this kind of mentality and thinks him/her as VIP on that position, public must not vote him/her to make him/her reach at that position. But, the sad thing is that, it is not happening. UP really need honest and service oriented lok-sevaks rather than rulers or VIPs. If a public representative can understand this, he/she will be happy in being in opposition rather than forming the government by any means (hook or crook). This phenomenon basically results in general public/opposition as boss and not the government/lok-sevaks. 

 

In one of the author’s encounters with a resident of his district Ballia in UP, India, he found that resident was unhappy with the DM of Ballia. This was because DM wasn’t handling his complaint properly. He reported that DM treated him in-humanly and shouted on him because he pointed out the DM’s mistakes and faults. The DM took it heartily since his ego was hurt and didn’t solve the problem. This should not happen in democratic state. A citizen has right in a democratic state to argue and correct the government official for his/her mistakes. A citizen is eligible to check the accountability of DM and not only MLAs, MPs or DM’s bosses. Rather than inhumanly treating the general public, the DM should correct himself/herself and apologize, if he/she is wrong. Author’s district-man explained beautifully that in a democratic structure, he is one of the bosses of DM, Chief Minister (CM) or even Governor and has right to direct and govern them. Author asked him how? He described as DM bends to CM, ministers or politicians because they are DM’s boss. Also, politicians help in appointing the governors. CM, ministers, politicians and public representatives bend to general public for getting the votes. Since he is part of a general public, thus is indirectly the boss of DM. The author was stumped by the analogy given by his district man. But does this really work in UP or will work in UP, is a million rupees question. Do politicians and bureaucrats allow the democracy to work like this in UP? This would be an ideal democracy which we would like to see happen one day in UP. We listen in political rallies where politicians regarding public as their god and say they are there to serve them, but this could be only a gimmick, or trick and tactic to please the public and rule them. In real life, they don’t think so.

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One Response to “जनता के लिए प्रदत्त सरकारी सेवाएं – On “Services” – by Dr. Vinaya K. Singh, Ph.D.”

  1. S. N. Singh Welfare & Education Society and its Mission « How to transform Uttar Pradesh (UP) into Uttam Pradesh (Best State) Says:

    […] On “Services” – by Dr. Vinaya K. Singh […]

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